212 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के संघर्ष में कोई भी कांग्रेसी आगे बढ़कर उनकी मदद नहीं करेगा। वास्तविकता तो यह है कि श्री गांधी के इस रवैए ने ही कांग्रेसी हिंदुओं को रुढि़वादी हिंदुओं के साथ जोड़ दिया। वे तो सगोत्र और सजातीय हैं। दोनों को विभाजित करने वाली रेखा भी बहुत ही महीन है। वे निस्संकोच होकर अस्पृश्यों के सिर तोड़ते-फोड़ते हैं। यदि विकृत नहीं तो अपने निहायत बेतुके रवैए से श्री गांधी ने केवल यही शरारत नहीं की। उन्होंने न केवल खुले आम यह कहा कि मुसलमान, ईसाई, पारसी और यहूदी कोई मदद न दें, बल्कि उन्होंने तो आपत्ति करते हुए सिखों से भी कहा, जो एक प्रकार से युद्धप्रिय और प्रोटेस्टैंट हिंदू ही हैं, कि वे अस्पृश्यों की मदद न करें। यहां भी उनका तर्क दुनिया से निराला था। अस्पृश्यता तो सवर्ण हिंदुओं का पाप है। उन्हें ही उसका प्रायश्चित करना होगा। अस्पृश्यों की मदद करना एक प्रायश्चित है और प्रायश्चित तो पापी का दायित्व है, अतः केवल पापी ही सत्याग्रह कर सकता है और उनकी सहायता कर सकता है। अस्पृश्यता के मामले में मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी और सिख पापी नहीं हैं। अतः अस्पृश्यता-निवारण के सत्याग्रह में वे मदद नहीं दे सकते। निश्चय ही श्री गांधी ने उसे अस्पृश्यों के दृष्टिकोण से नहीं देखा। उन्होंने यह नहीं देखा कि जो सवर्ण हिंदुओं के लिए पाप है, वही अस्पृश्यों के लिए गुलामी है। यदि पापी को प्रायश्चित करना ही पड़ता है, तो गुलाम को भी अपनी गुलामी के बंधनों से मुक्त होने का अधिकार है और आजादी का समर्थन करने वाले हर व्यक्ति का, चाहे वह किसी भी जाति या पंथ का हो, यह अनिवार्य कर्तव्य हो जाता है कि वह बिना किसी संकोच के संघर्ष में मदद दे और उसमें भाग ले। खिलाफत के मसले के बारे में श्री गांधी ने ठीक ऐसा ही दृष्टिकोण अपनाया था। मुसलमान खिलाफत और तुर्की की राज्य-क्षेत्रीय अखंडता चाहते थे। तुर्की की राज्य-क्षेत्रीय अखंडता की मांग अति असंभव मांग थी, क्योंकि इसका अर्थ था कि अरब तुर्कों के गुलाम हो जाएं। फिर भी मुसलमान इस पर आग्रह करते रहे और मुसलमानों की इस नामुमकिन और नापाक मांग के समर्थन के लिए श्री गांधी ने समूची कांग्रेस और हिंदुओं को राजी कर लिया। श्री गांधी की दलील थी कि यदि तुर्की की राज्य-क्षेत्रीय अखंडता के लिए संघर्ष करने को मुसलमान अपना धार्मिक कर्तव्य समझते हैं, तो हिंदुओं का यह दायित्व है कि वे मुसलमानों के कर्तव्य-पालन में उनकी मदद करें। ख्1,
- 1920 में कलकत्ता के विशेष कांग्रेस अधिवेशन में एक संकल्प पारित किया गया, उसका एक अंश
नीचे उद्धृत किया गया हैः
इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि खिलाफत के मसले के बारे में भारत और सम्राट की
सरकारें भारत के मुसलमानों के प्रति अपने कर्तव्य-पालन में बुरी तरह विफल हो गई हैं और प्रधानमंत्री
ने जान-बूझकर उन्हें दिए गए अपने वचन को भंग किया है, हर गैर-मुस्लिम भारतीय का यह कर्तव्य
है कि अपने मुसलमान भाई पर जो धार्मिक आपदा आ पड़ी है, उसे दूर करने के उसके प्रयास में हर
वैध तरीके से उसकी मदद की जाए।