श्री गांधी की छत्रछाया में
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पर श्री गांधी इस बात के लिए तैयार नहीं हुए कि इस तर्क का लाभ अस्पृश्यों को भी मिले। वह अड़ गए। अहिंदू, हिंदू की मदद कर सकता है। हिंदू, अहिंदू की मदद कर सकता है। लेकिन किसी को भी अस्पृश्य की मदद नहीं चाहिए। ख्1, श्री गांधी के दोस्त आतुर थे कि उनके तर्क की कठोरता को कुछ कम किया जाए। उन्होंने कहा कि अस्पृश्यों की असुविधाओं की प्रकृति के आधार पर कोई विभेद आवश्यक है। उनका तर्क ख्2, था कि अस्पश्ृयों की कुछ असुविधाएं नागरिक हैं, कुछ धार्मिक हैं और जहां तक नागरिक असुविधाओं का संबंध है, अहिंदुओं को भी अनुमति दी जाए कि वे अस्पृश्यों के सत्याग्रह में उनकी मदद करें। श्री गांधी इसे भी सुनने के लिए तैयार नहीं हुए। उनका निषेधादेश सभी अवस्थाओं के लिए था और कोई भी विभेद संभव नहीं था। बाह्य सहायता संबंधी निषेध की इस तलवार से ‘अस्पृश्यों के मित्र’ श्री गांधी ने अस्पृश्यों की मदद की डोर ही काट दी और उन्हें युद्ध की कुमुक से पूर्णतया वंचित कर दिया।
III
अभी तक मैंने बताया है कि किस प्रकार कांग्रेस ने अपनी अंतरत्मा की परवाह न करते हुए अस्पृश्यों के उत्थान का विचार त्याग दिया। उसने उसे हाथ तक नहीं लगाया। दूसरे, मेंने बताया है कि सवर्ण हिंदुओं के खिलाफ अस्पृश्यों के सत्याग्रह में वह उन्हें समर्थन देने में विफल रहे, लेकिन अपने निराले तर्क द्वारा श्री गांधी ने इस बात का औचित्य खोज लिया कि न तो उन्हें मदद दी जाए और न ही उनकी मदद करने दी जाए। अब इस अवधि की तीसरी और अंतिम घटना का उल्लेख शेष रह जाता है। भले ही अवधि की दृष्टि से वह अंतिम घटना है, पर महत्व की दृष्टि से निश्चय ही वह प्रथम है। यह घटना वह कसौटी है, जिसके आधार पर अस्पृश्यों का मित्र होने का श्री गांधी का दावा खरा या खोटा सिद्ध हो सकता है।
इस घटना का संबंध भारतीय गोलमेज सम्मेलन में दलित वर्गों के प्रतिनिधियों की मांगों से और उनके प्रति श्री गांधी के रवैए से है। मांगों में कहा गया था कि नए संविधान में राजनीतिक रक्षा के उपायों को शामिल किया जाए। इनमें से सर्वाधिक महत्व की मांग का संबंध विधान-मंडलों में दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व से था। दलित वर्गों के प्रतिनिधियों की मांग इस प्रकार थी µ
विधान-मंडलों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व
दलित वर्गों को पर्याप्त राजनीतिक सत्ता देनी ही होगी, ताकि अपना कल्याण सुनिश्चित करने के लिए वे विधायी तथा प्रशासी कार्य पर प्रभाव डाल सकें। इस
यंग इंडिया
वही