10. श्री गांधी की छत्राछाया में - Page 229

214 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दृष्टि से वे मांग करते हें कि उन्हें निम्न अधिकार देने के लिए निर्वाचन-कानून में प्रावधान करने ही होंगेः

  1. देश, प्रांत तथा केंद्र के विधान-मंडलों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व का अधिकार,

और

  1. अपने ही व्यक्तियों को अपने प्रतिनिधि के रूप में चुनने का अधिकार,

(क) व्यस्क मताधिकार द्वारा, और

(ख) प्रथम दस वर्षों तक पृथक निर्वाचक-मंडलों द्वारा और उसके बाद

संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्रों और आरक्षित सीटों द्वारा इससे यह अंतर्नि­

हत है कि जब तक संयुक्त निर्वाचक-मंडलों के साथ व्यस्क

मताधिकार की व्यवस्था न हो, तब तक दलित वर्गों की इच्छा के

विरुद्ध संयुक्त निर्वाचक-मंडल उन पर थोपे नहीं जाएंगे।

दलित वर्गों की तरह यही वह खास मांग है, जिसके कारण बवंडर मंच गया। मसले ने इतना उग्र रूप धारण कर लिया है कि उसके समाधान ने एक प्रकार से भारतीय राजनीति और हिंदू समाज की नींव को ही चरमरा दिया।

दलित वर्गों की यह मांग साइमन कमीशन की सिफारिश पर आधारित थी। दलित वर्गों की समस्या का सावधानी से सर्वेक्षण करने के बाद साइमन कमीशन ने निम्न आशय की रिपोर्ट दी कि नए संविधान में उनका क्या स्थान होः

...यह स्पष्ट है कि मताधिकार की पात्रता को काफी कम दिए जाने के बाद

भी दलित वर्ग यह आशा नहीं कर सकेंगे कि विशेश प्रावधान के बिना सामान्य

निर्वाचन-क्षेत्रों में वे अपने प्रतिनिधियों का निर्वाचन करा सकेंगे।... अंतत हमें

आशा करनी चाहिए कि वे विशेष संरक्षण के बिना संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्रों में

अपने पैर जमा सकें... लेकिन इन दिशा में वे कोई प्रगति नहीं करेंगे, जब तक

कि केवल नामंकन द्वारा उन्हें प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाता है, क्योंकि नामंकन

उन्हें राजनीति के बारे में कोई प्रशिक्षण नहीं देता। वर्तमान सीमित मताधिकार

होने पर भी दलित वर्गों के ऐसे पर्याप्त मतदाता हैं, तो निर्वाचन की प्रणालियों

को संभव बना सकते हैं।....

अतः हमारा उद्देश्य एक शुरूआत करना है। उससे दलित वर्ग निर्वाचित

प्रतिनिधान के दायरे में आ जाएंगे। इसे कैसे किया जाएगा? हमारे समक्ष पेश

होने वाले दलित वर्गों के अधिकांश संगठनों ने ऐसे पृथक निर्वाचक-मंडलों का

समर्थन किया, जिसमें आबादी के आधार पर सीटें आबंटित की जाएं।... इसमें

संदेह नहीं कि पृथक निर्वाचक-मंडल इस बात के लिए सबसे सुरक्षित उपाय