10. श्री गांधी की छत्राछाया में - Page 230

श्री गांधी की छत्रछाया में

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होगा कि दलित वर्गों के विश्वासपात्र व्यक्ति पर्याप्त संख्या में चुने जा सकें,

लेकिन हम नहीं चाहते कि ऐसे कदम से हम दलित वर्गों तथा शेष हिंदुओं के

विभेद को रुढि़वाद बना दें। हमारा विचार है कि उसके कारण हम एक नया तथा

गंभीर अवरोध खड़ा कर देंगे और वह औरों के साथ उनका अंतिम राजनीतिक

घुलन-मिलन नहीं होने देगा।....

अतः हमारा प्रस्ताव है कि सभी आठ प्रांतों में दलित वर्गों के लिए सीटों

का कुछ-न-कुछ आरक्षण होना चाहिए।....

हमारी योजना का परिणाम यह होगा कि हर प्रांत में दलित वर्गों के प्रवक्ता

निर्वाचित सदस्यों के रूप में चुने जा सकेंगे।.... जहां तक आरक्षित की जाने

वाली सीटों का संबंध है, जाहिर है कि प्रांत में दलित वर्गां की कुल आबादी

से उनका कुछ अनुपात होना चाहिए।... हमारा प्रस्ताव है कि... भारत के सभी

सामान्य निर्वाचन-क्षेत्रों की कुल सीटों के साथ ऐसी आरक्षित सीटों की संख्या

का अनुपात प्रांत के निर्वाचन-क्षेत्र की कुल आबादी से दलित वर्गों की आबादी

के अनुपात का तीन-चौथाई होना चाहिए। ख्1,

वस्तुतः स्वयं उनके लिए, स्वयं उनके द्वारा और स्वंय उनके माध्यम से पृथक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की दलित वर्गों की इस मांग में कुछ भी नया नहीं है। अतः यह नहीं कहा जा सकता है कि उसे स्वीकार करके साइमन कमीशन ने कोई नई धारा प्रवाहित की है। यह मांग 1919 में की गई थी।

बाद में 1919 के अधिनियम में शामिल कर लिए गए सुधारों पर जब विचार किया जा रहा था तो मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट को तैयार करने वालों ने स्पष्टतः अस्पृश्यों की समस्या को स्वीकार किया और उन्होंने वचन दिया कि वे विधान-मंडलों में उनके प्रतिनिधित्व की सर्वोत्तम व्यवस्था करेंगे। लेकिन मताधिकार तथा निर्वाचन प्रणाली तैयार करने के लिए लार्ड साउथबरो की अध्यक्षता में जो कमेटी नियुक्त की गई है, उसने उनकी पूर्ण उपेक्षा की। भारत सरकार ने इस रवैए का अनुमोदन नहीं किया और उसने निम्न टिप्पणियां कींः

वे (अस्पृश्य) कुल आबादी का पांचवां भाग हैं और मार्ले-मिंटो परिषदों

में उन्हें कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया है। कमेटी की रिपोर्ट में अस्पृश्यों का

दो बार उल्लेख किया गया है, लेकिन केवल यह स्पष्ट करने के लिए कि

निर्वाचन-क्षेत्रों की स्थिति संतोषजनक न होने के कारण नामांकन द्वारा उन्हें

प्रतिनिधित्व दिया गया है। रिपोर्ट में इन लोगों के स्वावलंबन की स्थिति पर

कोई विचार प्रकट नहीं किया गया है, न ही नामांकन की संख्या का सुझाव

  1. रिपोर्ट, इस ग्रंथ-माला के खंड 4, पृ. 75-76