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सभ्यता या घोर असभ्यता

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हैं। शंकु के शीर्ष से ढाल देकर चारों ओर नीचे तक बांस की लंबी पट्टियां लगी होती हैं और इन्हें घासफूस से ढक दिया जाता है, जो छप्पर का काम करता है। .... माल-मते के रूप में उनके पास कुछ नहीं होता। वे नाममात्र के कपड़े पहनते हैं। पुरुष लंगोटी और कच्छा पहनते हैं और महिलाएं एक छोटी-सी अंगिया और पेटीकोट पहनती हैं। यही उनके वस्त्र होते हैं। इसके अलावा खाना पकोन के कुछ बर्तन और एक-दो टोकरियों होती हैं। कभी-कभी उनमें अनाज रखा होता है। वे पशु और बकरियां पालते हैं। केवल इसी गांव में थोड़ी-बहुत खेती होती है। अन्यत्र वे अपने निर्वाह के लिए शहद और जंगलों में पैदा होने वाली सामग्री पर निर्भर रहते हैं, जिन्हें वे बेचा करते हैं। मोरिया नामक एक अन्य आदि जाति के बारे में कहा जाता है कि पुरुष सामान्यतः कमर के नीचे घुटने के ऊपर तक धोतीनुमा अंगोछा बांधे रहते हैं, जिसका पल्ला सामने लटका रहता है। वे मनकों की माला भी पहनते हैं, और नृत्य करते समय वे अपने साफों में मुर्गे और मोर के पंख खोंस लेते हैं। अनेक लड़कियां अपने शरीर को, विशेषतः अपने चेहरे को गुदवा लेती हैं। कुछ तो अपनी टांगों पर भी गुदने गुदवा लेती हैं। किये गुदने निज़ी रुचि के अनुसार विभिन्न आकृतियों के होते हैं। गोदने का यह काम सुई और कांटे से किया जाता है। उनमें से अनेक अपने बालों में जंगली मुर्गों के पंख लगा लेती हैं। वे अपने सिर लकड़ी के कंघों, टीन और पीतल से भी सजा लेती हैं।

इन आदिम जातियों को खाने के मामले में कोई परहेज नहीं होता। ये कीड़े-मकोड़े तक खाती हैं। वास्तव में किसी तरह का शायद ही कोई मांस हो, जो ये नहीं खातीं। ये मरे हुए जानवर का भी मांस खा लेती हैं, चाहे वह अपनी मौत से मरा हो या चाहे वह चीते के द्वारा चार-पांच दिन पहले मरा हुआ क्यों न हो।

सभी प्रकार के भूत-प्रेतों और अपने मरे बाप-दादाओं की पूजा करना ही उनका धर्म है। जादू-टोना, झाड़-फूंक, पशुओं और मानवों की बलि चढ़ाना इनके धार्मिक विधान हैं।

ये आदिम जातियां शिक्षा का पूर्ण अभाव होने, विज्ञान की कुछ भी भनक न होने, प्रकृति के कार्यकलाप की कुछ भी जानकारी न होने, अज्ञान और अंधविश्वास से ग्रस्त होने के कारण सभ्यता की सीमा रेखा से बाहर और उसकी स्थापित व्यवस्था के अनुसार सदियों से जंगली जीवन बिताती आ रही हैं।

कभी पिंडारियों और ठगों को भी जरायम-पेशा जाति कहा जाता था, जिनके बड़े-बड़े दल होते थे।