10. श्री गांधी की छत्राछाया में - Page 231

216 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दिया गया है।... उन्होंने जिस प्रतिनिधित्व की मात्रा का प्रस्ताव किया है, उसमें

सुझाव दिया गया है कि ब्रिटिश भारत की कुल जनसंख्या के पांचवें भाग को

कोई आठ सौ सीटों में से सात सीटें दी जाएं। यह सच है कि सभी परिषदों

में मोटे तौर पर पदाधिकारियों का छठा भाग ऐसा होगा, जिससे अपेक्षा की

जा सकती है कि वह उनके हितों का ध्यान रखेगा, लेकिन हमारी राय में वह

व्यवस्था सुधारों संबंधी रिपोर्ट के लक्ष्य से मेल नहीं खाती। रिपोर्ट तैयार करने

वालों ने कहा कि अस्पृश्यों को भी आत्मरक्षा का पाठ पढ़ना चाहिए। निश्चय

ही यह आशा मृगमारीचिका जैसी ही होगी कि साठ या सत्तर सवर्ण हिंदुओं

वाली असेंबली में अस्पृश्य समुदाय के केवल एक प्रतिनिधि को शामिल करके

यह परिणाम प्राप्त किया जा सकता है। रिपोर्ट के सिद्धांतों को साकार करने के

लिए हमें बहिष्कृतों के साथ और अधिक उदार व्यवहार करना ही होगा। सरकार

ने सिफारिश की कि कमेटी अस्पृश्यों के लिए दुगनी सीटों का आबंटन करे।

तदनुसार सात सीटों के स्थान पर उसने चौदह सीटें दीं।

पुनः 1293 में भारत मंत्री (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) ने मुडीमैन नामक कमेटी नियुक्त की। कमेटी का प्रमुख उद्देश्य यह खोजना था कि नियमों में परिवर्तन करके और अधिनियम में परिवर्तन न करके 1919 के अधिनियम द्वारा स्थापित संविधान का कहां तक विस्तार किया जा सकता है। कमेटी ने कुछ सिफारिशें कीं और कहा कि विधान-मंडलों में दलित वर्गों के प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। भारत मंत्री ने सिफारिश मान ली और सीटों की संख्या बढ़ा दी।

इस प्रकार विधान-मंडल में दलित वर्गों के विशेष प्रतिनिधित्व के अधिकार ने ऐसे सिद्धांत का रूप धारण कर लिया था, जिसे संविधान में न केवल स्वीकार किया गया, अपितु अपनाया भी गया। इस सिद्धांत को इतनी विशद् मान्यता दी गई कि उसे जिला स्थानीय बोर्डों, स्कूल बोर्डों और नगरपालिकाओं पर भी लागू किया गया।

जिस मांग को 1919 में कानूनी मान्यता दे दी गई थी, जिसने उसके द्वारा अधिकार का रूप धारण कर लिया था और जिसे प्रयोग ने पूर्णता प्रदान कर दी थी, उसके बारे में दलित वर्गों के प्रतिनिधियों का विचार है कि वह निर्विवाद है। कोई उस पर आपत्ति नहीं कर सकता। यह आशंका निर्मूल है कि दलित वर्गों के इस अधिकार को चुनौती देने के लिए कांग्रेस गंभीरतापूर्वक आगे आएगी, क्योंकि भले ही 1929 में नेहरू कमेटी द्वारा रचित स्वराज संविधान में दलित वर्गों को यह अधिकार नहीं दिया गया था, पर कमेटी की रिपोर्ट कांग्रेस के लिए बाध्यकारी नहीं थी। कांग्रेस तो आबद्ध थी केवल अपने संकल्प से, जो उसने 1920 में अपने नागपुर अधिवेशन में सिखों की आशंका को दूर करने के लिए पारित किया था। संकल्प में उसकी इस नीति की