10. श्री गांधी की छत्राछाया में - Page 237

222 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पर मुझे खेद है कि इस मसले के बारे में उन्होंने अपना विवेक खो दिया है। मैं

उनके इस दावे का खंडन करता हूं कि वह अस्पृश्यों के प्रतिनिधि हैं।

उनके किसी भी तर्क में दृढ़ धारणा नहीं थी। वस्तुतः वह हो भी नहीं सकती थी। वे सबके सब लंबे-चौड़े थे और उनमें विशेष तर्कों का चक्र था।

उनका प्रथम तक है कि कांग्रेस ने तो अस्पृश्यों की देखभाल की तथा उनकी अस्पृश्यता के निवारण की शपथ ले रखी है। क्या यह सत्य पर आधारित है। श्री गांधी संसार को बताते रहे हैं कि कांग्रेस के पूरे संगठन ने अस्पृश्यता को मिटाने की शपथ ली है और उनके मित्र उन्हें इस बात का श्रेय देते रहे हैं कि वह कांग्रेस से वह करा रहे हैं, जो उनसे पूर्व वह करने के लिए तैयार नहीं थी। मुझे आश्चर्य है कि ऐसी झूठी बात का इतना व्यापक प्रचार-प्रसार कैसे हो सका। मैंने 1920 में नागपुर में कांग्रेस द्वारा पारित संकल्प को बार-बार पढ़ा। वह श्री गांधी तथा उनके मित्रों की लंबी-चौड़ी डींग का आधार है। मुझे विश्वास है कि उस संकल्प को पढ़ने वाला हर व्यक्ति यह स्वीकार करेगा कि संकल्प का मूलपाठ ऐसी किसी डींग का प्रमाण नहीं देता। संकल्प गांधीवादी हथकंडों का बड़ी ही चतुरतापूर्ण नमूना है। श्री गांधी प्रारंभ से ही इस बात के लिए आतुर रहे हैं कि अस्पृश्य केवल हिंदुओं की जागीर बने रहें। वह नहीं चाहते थे कि मुसलमान और ईसाई उनमें रुचि लें। वह चाहते थे कि अंग्रेजों से जुड़े अस्पृश्यों को उनसे तोड़ा जाए और उन्हें हिंदुओं से जोड़ा जाए। दूसरा प्रयोजन तभी सिद्ध हो सकता था, जब अस्पृश्यता-निवारण के पक्ष में संकल्प कांग्रेस के मंच से पारित किया जाए। इसे प्राप्त करने के लिए जरूरी था कि वह कर्तव्य केवल हिंदुओं को सौंपा जाए। संकल्प भी यही कहता है। चालक राजनेता की यह चतुरतापूर्ण चाल है। संकल्प समूची कांग्रेस को इस संकल्प का पक्षधर नहीं बनाता। दूसरे, जितना पक्षधर वह बनाता है, उसमें ऐसा कुछ नहीं है जो बाध्यकारी हो। उसमें न कोई प्रतिज्ञा है, न कोई शपथ है। उसमें केवल नैतिक उपदेश है। वह हिंदुओं से केवल सिफारिश करता है कि अस्पृश्यता-निवारण उनका कर्तव्य है। एक बार श्री गांधी ने कोशिश की कि कांग्रेस की सदस्यता की शर्तों को बदलें। सदस्यता के लिए चार आने प्रति वर्ष की अदायगी की शर्त के स्थान पर श्री गांधी चाहते थे कि दो शर्तें रखी जाएंः (1) अस्पृश्यता-निवारण, और (2) सूत की कताई। कांग्रेस-जन सूत की कताई की शर्त को तो मानने के लिए तैयार थे, पर वे अस्पृश्यता-निवारण की शर्त मानने के लिए तैयार नहीं थे। कांग्रेस-जनों ने श्री गांधी से कहा कि यदि वह इसका आग्रह करेंगे, तो सभी कांग्रेस कमेटियों को बंद करना पड़ेगा। विरोध इतना प्रबल था कि श्री गांधी को अपना प्रस्ताव वापस लेना पड़ा। ऐसी स्थिति में भी जब श्री गांधी ने गोलमेज सम्मेलन के सामने आग्रह किया कि कांग्रेस ने तो अस्पृश्यता-निवारण की शपथ ले रखी है और अस्पृश्यों को बिना किसी संकोच के हिंदुओं की दया पर