श्री गांधी की छत्रछाया में
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छोड़ा जा सकता है, तो वह दर्शाता है कि श्री गांधी सच में कंजूसी करके उसे झूठ के कगार तक ले जा सकते हैं।
कांग्रेस की निष्ठा को सिद्ध करने के लिए दिए गए इस तर्क को कि स्वराज के लिए कांग्रेस ने अस्पृश्यता-निवारण की शर्त रखी थी, कांग्रेस तथा श्री गांधी की प्रत्यक्ष अनिष्ठा को देखते हुए सही नहीं माना जा सकता। अस्पृश्यता ज्यों-की-त्यों बनी रही, फिर भी कांग्रेस और श्री गांधी स्वाधीनता की मांग लेकर आए। इससे पूरी तरह पता चलता है कि श्री गांधी इस मुद्दे के बारे में विश्वास नहीं रखते। न तो भारत में किसी और न ही अस्पृश्यों में से किसी को श्री गांधी और उनकी कांगे्रस की इस घोषणा पर विश्वास है कि स्वराज के लिए अस्पृश्यता-निवारण उनकी एक पूर्व शर्त है। गोलमेज सम्मेलन से काफी पहले दो अवसरों पर श्री गांधी की निष्ठा को परखने के लिए उनसे प्रश्न किए गए थे और दोनों अवसरों पर उन्होंने जो उत्तर दिए, उनसे यह संदेह नहीं रह जाता है कि वह भी इस घोषणा के प्रति विश्वास नहीं रखते थे।
1920 में एक संवाददाता ने श्री गांधी से यह प्रश्न किया ख्1, ः ‘इससे पहले
कि हम अंग्रेजों से कहें कि वे अपने खून में सने हाथ धो लें, क्यों न हम हिंदू
अपने ऐसे हाथ धो लें?’
श्री गांधी ने यह उत्तर दियाः
अन्यत्र उद्धृत एक करुणा-भरे पत्र में एक संवाददाता ने मुझसे कुपित होकर
पूछा है कि मैं (अस्पृश्यों) के लिए क्या कर रहा हूं। मैंने संवाददाता को वह पत्र
उसके निजी शीर्षक µ इससे पहले कि हम अंग्रेजों से कहें कि वे अपने खून में
सने हाथ धो लें, क्यों न हम हिंदू अपने ऐसे हाथ धो लें, के साथ दे दिया। यह
विचारपूर्ण रूप से प्रस्तुत उचित प्रश्न है। और यदि गुलाम राष्ट्र को कोई सदस्य मुझे
स्वयं मेरी गुलामी से मुक्त कराए बिना दलित वर्गों को उनकी गुलामी से मुक्त करा
सकता है, तो मैं आज वैसा करूंगा। लेकिन यह एक असंभव कार्य है।...
क्या इससे पता चलता है कि श्री गांधी और कांगे्रस के इस कथन में सच्चाई थी कि स्वराज के लिए अस्पृश्यता-निवारण एक पूर्व शर्त है? यह सच्चे आदमी का तर्क नहीं है, यह इस तथ्य से पता चलता है कि बाद में श्री गांधी ने एक संवाददाता का उपहास किया था, जिसने श्री गांधी से आग्रह किया था कि जब तक हिंदू स्वराज प्राप्त न कर लें, अस्पृश्यों के प्रश्न को ताक पर रखना अवांछनीय है।
दूसरे अवसर पर श्री गांधी से प्रश्न उस समय किया गया, जब वह मार्च 1930 में कानून तोड़कर नमक सत्याग्रह करने डांडी गए थे। कुछ अस्पृश्य डांडी गए
- यंग इंडिया, 27 अक्तूबर, 1920