10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पिंडारी लोग हथियारबंद डकैत होते थे, इनका काम लूटपाट करना था। उनका संगठन लुटेरों का खुला सैन्य संगठन था। उनके पास 20,000 या उससे भी अधिक बढि़या घोड़े होते थे। उनका एक मुखिया होता था। इनमें चित्तू एक सर्वाधिक शक्तिशाली मुख्यि था। अकेले उसी के पास 10,000 घोड़े थे, जिसमें 5,000 बढि़या घुड़सवार थे। इसके अलावा उसके पास पैदल और तोपें भी थीं। इस विशाल सैन्य-बल को काम देने के लिए पिंडारियों के पास कोई फौजी योजना तो थी नहीं। अतः इनका विकास पेशेवर लुटेरों के गिरोहों में होता गया। उनका ध्येय किसी को जीतना नहीं था। इनका ध्येय तो लूटपाट कर अपने लिए माल और नकदी प्राप्त करना था। लूटमार और लूटपाट ही उनका धंधा था। वे किसी को अपना शासक नहीं मानते थे। वे किसी के अधीन नहीं थे। किसी के प्रति वे वफादार नहीं थे। वे किसी का भी आदर नहीं करते थे। उच्च हो या नीच, गरीब हो या अमीर, वे सभी को बिना किसी डर और दया के लूटते थे।
ठग ख्1, पेशेवर हत्यारों की सुसंगठित जाति थी। वे भारत-भर में अलग-अलग वेष में 10 से लेकर 200 तक की टोलियों में घूमते थे। वे धनी वर्ग के राहगीरों का विश्वास प्राप्त कर लेते थे। जैसे ही उन्हें कोई अनुकूल अवसर मिलता था, वैसे ही वे इन राहगीरों के गले में कपड़े या रस्सी का फंदा डालकर उनका गला घोंटकर उन्हें मार डालते थे और उनका सारा माल छीनकर उनके शव को जमीन में गाड़ देते थे। वे यह सब काम कतिपय प्राचीन तथा कड़ाई के साथ निश्चित रीति के अनुसार और विशेष धार्मिक अनुष्ठान के बाद करते थे, जिसमें कुल्हाड़ी की पूजा और गुड़ के द्वारा हवन किया जाता था। वे काली के कट्टर भक्त होते थे, जो हिंदुओं में बलि की देवी मानी जाती है। किसी भी लाभ के लिए हत्या करना उनकी दृष्टि में पुण्य कार्य था। उसे वे पवित्र और सम्मानजनक पेशा समझते थे। वास्तव में उन्हें बुरे-भले का कोई ज्ञान नहीं था और उनके मन में नैतिकता जागृत ही नहीं होती थी। वे इसी देवी के आदेश से और इसी देवी के निमित्त अपना सारा कारोबार करते थे। इस देवी की इच्छा उन्हें अनेक गूढ़ संकेतों से ज्ञात हो जाती थी। इन संकेतों के अनुपालनार्थ वे अपने शिकार के साथ-साथ या उसके पीछे-पीछे सैंकड़ों मील की यात्रा करते थे और जब भी मौका मिलता था, तब वे अपना काम पूरा करते थे। काम के हो जाने पर वे अपनी अधिष्ठाती देवी के सम्मान में अनुष्ठान करते थे और लूट का अधिकांश भाग उसके लिए अलग से रख देते थे। ठगों की अपनी एक गुप्त भाषा और कुछ चिर्िं होते थे। इन्हीं के द्वारा वे भारत के दूरदराज के क्षेत्रों में भी एक-दूसरे को पहचान लेते थे। जो ठग बुढ़ापे के कारण ठगी के कार्यों में सक्रिय रूप से हिस्सा नहीं ले
- एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका, 11वां संस्करण, खंड 26, पृ. 896