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श्री गांधी की छत्रछाया में

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जो लोग अलग कुओं, अलग स्कूलों की व्यवस्था करना चाहते हैं, क्या उन्हें यह कहना शोभा देता है कि वे अलग प्रतिनिधित्व पर इसलिए आपत्ति करते हैं कि उससे विभाजन हो जाएगा? केवल वे ही लोग जो अवरोधों को समाप्त करने पर तुले हुए हैं, पृथक प्रतिनिधित्व के विरोध में बोल सकते हैं और कह सकते हैं कि उनके तर्क की सच्चाई पर विश्वास किया जाए।

श्री गांधी का अंतिम तर्क अजीबोगरीब है। यदि उच्चत वर्ग अस्पृश्यों का दमन कर सकते हैं और उनसे बदला ले सकते हैं, तो इसके पक्ष में तो और भी बड़ा कारण है कि उन्हें विशेष प्रतिनिधित्व दिया जाए, ताकि वे उच्चतर वर्गों के अत्याचार के विरोध में अपनी आवाज उठा सकें। श्री गांधी नितांत हताश हो गए हैं और उन्होंने अपना मानसिक विवेक और संतुलन इस हद तक गंवा दिया है कि उन्हें पता ही नहीं है कि उनके तर्क उन्हें कहां ले जाएंगे। प्रत्यक्ष है कि इस तर्क का प्रयोग करते समय वह भूल गए कि वह इस बात की वकालत कर रहे ळें कि अस्पृश्य सदा-सर्वदा हिंदुओं के दास बने रहें। संक्षेप में, श्री गांधी का तर्क है, ‘आजादी की मांग न करो, इससे तुम्हारे स्वामी नाराज हो जाएंगे और वे तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार करेंगे।’ यदि कोई अन्य व्यक्ति ऐसा तर्क प्रस्तुत करता तो उसे झूठा और पाखंडी कहा जाता।

जब श्री गांधी अस्पृश्यों की मांग के अनौचित्य को सिद्ध नहीं कर सके, तो उन्होंने दलित वर्गों के प्रतिनिधियों को अलग-थलग करने का निश्चय किया, ताकि उन्हें अन्य किसी क्षेत्र से मदद न मिल सके। श्री गांधी ने ऐसी योजना बनाई कि दलित वर्गों और मुसलमानों के बीच किसी समझौते की संभावना ही न रहे। योजना का आंशिक प्रयोजन यह था कि मुसलमानों को अपने पक्ष में मिला लिया जाए। इसके लिए उन्होंने मुसलमानों के साथ समझौता करने का प्रस्ताव रखा। इस समझौते को मुस्लिम प्रतिनिधियों में परिचालित किया गया। उसकी एक प्रति मेरे हाथ लग गई और मैं उसे यहां उद्धृत करता हूं। (नीचे यह मूलपाठ डॉ. अम्बेडकर की कृति ‘व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू दि अनटचेबिल्स’, पृ. 72-73 से उद्धृत किया गया है। मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में यह टंकित नहीं है µ संपादक)।

गांधी-मुस्लिम समझौत का मसौदा ख्1,

गोलमेज सम्मेलन के लिए मुस्लिम प्रतिनिधि-मंडल ख्2,

  1. इस दस्तावेज को 1939 में अपनी कृति ‘थाट्स आन पाकिस्तान’ के परिशिष्ट के रूप में मैंने छपवाया

था। तब वह पहली बार प्रकाश में आई थी। उसकी सत्यता पर कभी आपत्ति नहीं की गई है। मुझे यह

प्रति गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने वाले एक हिंदू प्रतिनिधि से मिली। उन्हें मुस्लिम लीग का राजदार

होने का सौभाग्य प्राप्त था।

  1. इससे पता चलता है कि यह दस्तावेज मुस्लिम लीग प्रतिनिधि-मंडल की लेखन-सामग्री पर टंकित किया

गया था।