श्री गांधी की छत्रछाया में
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मुस्लिम प्रस्ताव
- दोनों सदनों में केंद्रीय विधान-मंडल में मुस्लिम प्रतिनिधित्व ब्रिटिश भारत के
प्रतिधित्व की कुल संख्या का 26 प्रतिशत हो और देशी राज्यों के लिए जो कोटा
नियत किया जाए, उसमें से कम-से-कम रिवाज के अनुसार सात प्रतिशत कोटा
मुसलमानों का हो, अर्थात् कुल मिलाकर समूचे सदन का एक तिहाई हो।
अवशिष्ट शक्ति ब्रिटिश भारत के परिसंघात्मक प्रांतों के पास हो।
सहमति के लिए निम्न अन्य मुद्देः
(1) सिंध। ख्1,
(2) पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत। ख्2,
(3) सेवाएं । ख्3,
(4) मंत्रिमंडल। ख्4,
(5) मूल अधिकार और धर्म तथा संस्कृति के लिए रक्षा के उपाय।
(6) किसी समुदाय पर प्रभाव डालने वाले विधान से रक्षा के उपाय।
यह वह समझौता है, जिसे श्री गांधी मुसलमानों से करने के लिए तैयार थे। इस समझौते के द्वारा वह मुसलमानों की 14-सूत्री मांगे पूरी करने के लिए तैयार थे। बदले में श्री गांधी चाहते थे कि मुसलमान और बातों के अलावा इसके लिए राजी हो जाएं कि विशेष प्रतिनिधित्व के सिद्धांत का लाभ हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों को मिलता रहे। कोई यह प्रश्न कर सकता है कि ऐसे समझौते में क्या बुराई है। क्या कांग्रेस ने नहीं कहा है कि इन तीनों के अलावा किसी अन्य को सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व दिए जाने के लिए वे सहमत नहीं होंगे? ऐसे दृष्टिकोण को केवल सतही दृष्टिकोण ही माना जा सकता है। जिन लोगों को इसमें बुराई नहीं दीख पड़ती, उन्हें दो प्रश्नों का उत्तर देना होगा। पहला यह है कि श्री गांधी ने इस बात की जरूरत क्यों अनुभव की कि वह मुसलमानों को कांग्रेस की इस नीति से सहमत कराएं कि विशेष प्रतिनिधित्व का लाभ अन्य अल्पसंख्यकों तथा अस्पृश्यों को न दिया जाए। जैसे कि कांग्रेस दूसरे अल्पसंख्यकों से कहती आ रही थी, वैसे ही श्री गांधी भी उनसे कह सकते थे कि वह उनकी मांग स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। उनकी मांग का प्रतिरोध करने के लिए वह मुसलमानों को क्यों शामिल करना चाहते थे। और यदि उनका उद्देश्य
सिंध के विभाजन के लिए।
पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के लिए उत्तरदायी सरकार और प्रांतीय स्वायत्तता के लिए।
सेवाओं में प्रतिनिधित्व के लिए।
मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व के लिए।