228 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नहीं था, तो उन्होंने क्यों इसे उस समझौते की शर्त बनाया, जिसे उनके द्वारा स्वीकृत मांगों के बदले में मुसलमानों को करना था।
दूसरे, इस अवधि विशेश में ही क्यों श्री गांधी ने मुसलमानों के सामने उनकी 14 मांगे पूरी करने का प्रस्ताव रखा। मुसलमानों की इन 14 गलत या सही, राजनीतिक मांगों को सभी ने अस्वीकार कर दिया था। हिंदू महासभा और साइमन कमीशन ने उन्हें ठुकरा दिया था। कांग्रेस ने भी उन्हें ठुकरा दिया था। किसी भी क्षेत्र से मुसलमानों की इन 14 मांगों का समर्थन नहीं किया गया था। श्री गांधी ही क्यों उन्हें मानने के लिए तैयार हो गए? इसके सिवाय उनका और क्या उद्देश्य हो सकता है कि मुसलमानों को खरीद लिया जाए, ताकि उनकी मदद से वह अन्य अल्पसंख्यकों तथा अस्पृश्यों की मांग का प्रतिरोध और प्रभावी ढंग से कर सकें?
मेरे विचार में श्री गांधी नेकनीयती से कोई समझौता करने का प्रयास नहीं कर रहे थे। वह मुसलमानों को इस बात के लिए ललचा रहे थे कि वे अल्पतर अल्पसंख्यकों तथा अस्पृश्यों की मांग के विरोध की साजिश में उनका साथ दें। यह मुसलमानों के साथ समझौता नहीं था। यह तो अस्पृश्यों के खिलाफ साजिश थी। यह तो और भी बुरी बात थी। यह तो पीठ में छुरा घोंपने जैसा था।
यह तथाकथित समझौता निष्फल हो गया, क्योंकि और कारणों के अलावा मुसलमानों के लिए यह संभव नहीं था कि वे अस्पृश्यों को विशेष प्रतिनिधित्व के लाभ से वंचित किए जाने के लिए राजी हो जाएं। ऐसी योजना के लिए मुसलमान कैसे सहमत हो सकते थे? वे मुसलमानों को विशेष प्रतिनिधित्व प्रदान किए जाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। वे न केवल विशेष प्रतिनिधत्व के लिए अपितु अधि-प्रतिनिधित्व के लिए भी संघर्ष कर रहे थे। वे जानते थे कि मुसलमानों का मामला केवल इस आधार पर टिका है कि मुसलमानों ने कभी भारत पर राज किया था, अतः उन्हें राजनीतिक महत्व बनाए रखना है और चूंकि इसकी संभावना है कि हिंदू विधान-मंडलों के चुनावो में मुसलमानों के साथ भेदभाव करेंगे, अतः हो सकता है कि मुस्लिम पर्याप्त संख्या में विधान-मंडल में न आ सकें। इससे मुसलमानों का राजनीतिक सितारा डूब जाएगा। उन पर ऐसी आपदा न आए, इसके लिए उन्हें विशेष प्रतिनिधित्व दिया ही जाना चाहिए। मुस्लिमों के पक्ष में तो केवल एक यही आधार है। इसके मुकाबिले अस्पृश्यों की मांग के पक्ष में तो एक सौ आधार हैं। किस मुंह से मुसलमान अस्पृश्यों की इस मांग का विरोध कर सकते हैं?
मुसलमानों ने अपनी लज्जा या संतुलन को नहीं गंवाया था। उन्होंने ऐसे सौदे में शामिल होने से इंकार कर दिया, जिसे सरेआम उचित नहीं ठहराया जा सकता था। श्री गांधी फिर भी मुसलमान की खुशामद करते रहे। जब वह उन्हें 14-सूत्री मांगों की स्वीकृति जैसे