श्री गांधी की छत्रछाया में
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मूल्य से भी नहीं ललचा सके, क्योंकि मुसलमानों का विचार था कि दुनिया उसे मूल्य नहीं, अपितु पाप की मंजूरी मानेगी, तो श्री गांधी ने मुसलमानों के मजहबी उसूलों की दुहाई देने का प्रयास किया। 13 नवंबर ख्1,, 1931 को जब अल्पसंख्यकों संबंधी समझौता ख्2, गोलमेज सम्मेलन की अल्पसंख्यक उप-समिति के सामने प्रस्तुत किया गया, उससे एक दिन पूर्व श्री गांधी ‘कुरान’ की एक प्रति लेकर पिकाडिली स्थित रिट्ज होटल पहुंचे। वहां परम आदरणीय महामहिम आगा खां ठहरे हुए थे और वह वहां एकत्रित मुस्लिम प्रतिनिधियों से भेंट करने वाले थे। मुस्लिम प्रतिनिधियों से श्री गांधी ने पूछा, ‘पृथक प्रतिनिधि की अस्पृश्यों की मांग को स्वीकार करके आप हिंदू समाज का विभाजन क्यों कर रहे हैं? क्या ‘कुरान’ ऐसे काम की इजाजत देती है? मुझे दिखाइए कि कहां इजाजत देती है? यदि आप नहीं दिखा सकते हो तो क्या आप अपने मित्र समाज के प्रति ऐसे अपराध को होने से नहीं रोकंगे?’ मैं यह तो नहीं जानता था कि मुस्लिम प्रतिनिधियों ने श्री गांधी के इस सवाल का किस तरह जवाब दिया। निश्चय ही यह उनके लिए एक बड़ा ही टेढ़ा प्रश्न रहा होगा। पाक पैगंबर के मन में ऐसी आकस्मिकता के लिए कोई तुरंत समाधान नहीं हो सकता था और वह विशेषतः इसके लिए कोई समाधान प्रस्तुत भी नहीं कर सके होंगे। उनके अनुयायियों को पता था कि ऐसी आकस्मिकताएं उत्पन्न होंगी, जिनके लिए उन्होंने कोई निर्देश नहीं दिए हैं। अतः उन्होंने उनसे पूछा कि उन्हें क्या करना चाहिए। पैगंबर ने उन्हें यह सामान्य निर्देश दिया µ ऐसी सूरत में देखो कि ‘काफिर’ क्या कर रहे हैं और ठीक उसका उल्टा करो। ख्3, मैं दावे से तो नहीं कह सकता कि श्री गांधी को जवाब देने के लिए मुस्लिम प्रतिनिधियों ने इस निर्देश पर विश्वास किया या नहीं, मैंने तो वही कहा है, जो मैंने सुना है, और मेरा स्रोत अति विश्वस्त स्रोत है। यहां भी श्री गांधी ने अस्पृश्यों पर अपना गुस्सा उतारा तो मुसलमान चुप रहे।
श्री गांधी के इस आचरण के बारे में कोई क्या कह सकता है? श्री बर्नाड शा ने कहा है कि अंगेज हर काम सिद्धांत के अनुसार करते हैं।
उसी प्रकार श्री गांधी कहते हैं कि वह तो हर काम नैतिकता और नेकनीयती के सिद्धांत के अनुसार करते हैं। क्या श्री गांधी के कार्यों को न्याय और नेकनीयती की कसौटियों के अनुसार खरा सिद्ध किया जा सकता है? मुझे तो शंका है। प्रस्तुत हैं, कुछ तथ्य।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन के वास्ते लंदन रवाना होने से पहले मैं श्री गांधी से मिला था। उस समय मैंने श्री गांधी को सूचित किया था कि गोलमेज सम्मेलन में मैं
- देखिए, डॉ. अम्बेडकर की कृति, व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू दि अनटचेबिल्स, पृ. 67
- वही, परिशिष्ट III, पृ. 307-11
3 देखिए, कुरान।