232 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पर विचार करेगी? अथवा, क्या वह ईसाइयों, आंग्ल-भारतीयों और दलित वर्गां के मसले पर विचार करेगी?
यदि हम शुरुआत करने से पहले ही पूरी तरह समझ लें कि यह समिति न सिर्फ हिंदुओं और मुसलमानों के मसले से, सरोकार रखेगी, बल्कि यह दायित्व भी लेगी कि वह दलित वर्गों, आंग्ल-भारतीयों और ईसाइयों के मसले पर भी विचार करेगी, तो मैं पूरी तरह तैयार हूं कि इस स्थगन प्रस्ताव को बिना किसी आपत्ति के पारित होने दिया जाए। लेकिन मैं यह कहे बिना नहीं रहूंगा कि यदि मेरी उपेक्षा की जाएगी और यदि इस अंतराल का उपयोग हिंदू-मुसलमान मसले को हल करने के लिए किया जाएगा, तो मेरा आग्रह होगा कि बेहतर होगा कि स्वयं अल्पसंख्यकों संबंधी समिति ही इस मसले पर अपना सर खपाए, बजाए इसके कि केवल कुछ अल्पसंख्यकों के सांप्रदायिक मसले का हल खोजने के लिए कोई अन्य अनौपचारिक समिति इस मसले का निपटारा करे।
समिति के अध्यक्ष के नाते प्रधानमंत्री ने श्री गांधी से उनका दृष्टिकोण स्पष्ट करने के लिए कहा और श्री गांधी ने उत्तर में निम्न वक्तव्य दिया ख्1, ः
प्रधानमंत्री महोदय तथा मित्रों, मैं देख रहा हूं कि हममें से कुछ ने अपने सामने कार्य का जो क्षेत्र रखा है, उसके बारे में कुछ गलतफहमी है। मेरा विचार है कि डॉ. अम्बेडकर, कर्नल गिडनी तथा अन्य मित्र भविष्य के बारे में अकारण ही चिंतित हो रहे हैं। भारत के किसी एकल हित अथवा वर्ग अथवा व्यक्ति को भी राजनीतिक मान्यता दिए जाने से वंचित करने का मुझे क्या अधिकार है? कांग्रेस के प्रतिनिधि के नाते मैं उस विश्वास के योग्य नहीं रहूंगा, जो कांग्रेस ने मुझ पर किया है, यदि मैं एक भी राष्ट्रीय हित की बलि चढ़ाने का अपराध करूं। निश्चय ही मैंने इन मुद्दों के बारे में अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। मैं स्वीकार करना ही चाहूंगा कि मैं उन विचारों पर भी अटल हूं। लेकिन ऐसे अनेक रास्ते हैं, जिनके द्वारा हल एकल हित को सुरक्षा की गारंटी दी जा सकती है। यह काम उन लोगों का होगा, जो एक साथ मिल-बैठकर योजना तैयार करने की कोशिश करेंगे। हर कोई बिना किसी बाधा के इस अति अनौपचारिक सम्मेलन अथवा बैठक के सामने साग्रह अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सकेगा।
अतः मेरा विचार है कि किसी को भी आशंका नहीं होनी चाहिए कि वह अपनी राय व्यक्त नहीं कर सकेगा अथवा मनवा नहीं सकेगा। मेरी राय का महत्व भी हममें से हर किसी की राय के बराबर ही होगा। उसका औरों से अधिक महत्व नहीं होगा। मेरे पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है कि मैं किसी की राय
- देखिए, व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू दि अनटचेबिल्स, पृ. 62 (उपरोक्त दोनों उद्धरणों का उल्लेख अंग्रेजी की मूल पांडुलिपि में नहीं है µ संपादक।