श्री गांधी की छत्रछाया में
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को लांघकर अपनी राय मनवा लूं। मैंने तो राष्ट्रहित में केवल अपने विचार व्यक्त
किए हैं और जहां भी उपयुक्त होगा, मैं अपने इन विचारों को व्यक्त करूंगा
ही। यह काम आपका होगा कि आप इन रायों को स्वीकार करें या न करें।
हममें से हरेक यह विचार अपने मने से निकाल दे कि सम्मेलन में और मेरे द्व
ारा प्रस्तावित अनौपचारिक बैठकों में से किसी भी प्रकार के विरोध को जबरन
कुचल दिया जाएगा। लेकिन यदि आपका विचार है कि इस मेज पर तन कर
बैठने के बजाए यह और करीब आने का एक रास्ता है, तो आप इस स्थगन
प्रस्ताव को अस्वीकार नहीं करेंगे, अपितु इन अनौपचारिक बैठकों के संबंध में
मेरे प्रस्ताव से आप पूरे मन से सहयोग करेंगे।
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तब मैंने अपनी आपत्ति वापस ले ली।
अब यहां खुले सम्मेलन में श्री गांधी ने एक पक्का वचन दिया है कि यदि अन्य सभी लोग अस्पृश्यों की मांग को मान्यता देने के लिए सहमत हो जाएं तो वह आपत्ति नहीं करेंगे। और यह वचन देने के बाद श्री गांधी मुसलमानों को इस बात के लिए लालच देते रहे कि वे अस्पृश्यों की मांग को मान्यता न दें और उन्हें घूस देकर उकसाते रहे कि वे अपने वचन से मुकर जाएं। यह नेकनीयती है या विश्वासघात है? यदि यह विश्वासघात नहीं है, तो और किसे विश्वासघात कहा जा सकता है।
मुझे बलि का बकरा बना दिया गया, क्योंकि मैंने अल्पसंख्यकों संबंधी समझौते पर हस्ताक्षर किए। मुझे गद्दार कहा गया। पर मैंने समझौते पर हस्ताक्षर कर देने पर कभी कोई लज्जा अनुभव नहीं की। मुझे तो अपने आलोचकों के अज्ञान पर केवल तरस आता है। वे भूल जाते हैं कि अल्पसंख्यक भी वही रवैया अपना सकते थे, जो अल्स्टर ने आयरिश स्वराज के प्रति अपनाया था। रेडमंड अल्स्टरवासियों को हर प्रकार की सुरक्षा प्रदान करने के लिए तैयार थे। लेकिन अल्स्टरवासियों का उत्तर था, ‘भाड़ में जाए तुम्हारे प्रस्तावित सुरक्षा-उपाय, हमें नहीं चाहिए तुम्हारा शासन।’ हिंदुओं को तो अल्पसंख्यकों का आभार मानना चाहिए कि उन्होंने ऐसा कोई रवैया नहीं अपनाया। समझौते में केवल सुरक्षा के उपाय थे, उनके अलावा कुछ नहीं था। आभार मानने के बजाए श्री गांधी ने समझौते और उसे तैयार करने वालों को अपने कोप का भाजन बनाया। उन्होंने कहाः
जहां तक इस दस्तावेज ख्1, का संबंध है, मैं सर ह्यूबर्ट कार के धन्यवाद को
स्वीकार करता हूं। यदि मैं ये विचार प्रकट न करता जो मैंने भार वहन करते
समय प्रकट किए थे और यदि मैं समाधान खोजने में नितांत असफल न होता,
तो सर ह्यूबर्ट कार ने ठीक ही कहा कि वह अन्य अल्पसंख्यकों की साझेदारी
- संकेत ‘अल्पसंख्यकों’ संबंधी समझौते की ओर है।