234 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
में उस प्रसंशनीय समाधान को न खोज पाते, जिसे वह खोज सके हैं। उस पर
पहले यह समिति विचार करेगी और अंततः महामहिम की सरकार उस पर विचार
करके उसका अनुमोदन करेगी।
मैं सर ह्यूबर्ट कार तथा उनके सहयोगियों को उन्हें प्रत्यक्षतः उल्लसित करने
वाली संतोष की अनुभूति से वंचित नहीं करूंगा, लेकिन मेरा विचार है कि उन्होंने
तो बस यही किया है कि वे शव की बगल मे बैठ गए हैं और उन्होंने शव के
बंटवारे का प्रशंसनीय कार्य कर डाला है।
क्या श्री गांधी को क्रुद्ध होने का कोई अधिकार है? क्या उन्हें नैतिक क्षोभ का कोई अधिकार है? क्या उन्हें अल्पसंख्यकों पर पत्थर बरसाने का कोई अधिकार है? श्री गांधी यह भूल गए हैं कि वह भी उतने ही पापी हैं, जितने कि अल्पसंख्यक, और वह तो और भी गए-बीते पापी हैं, क्योंकि उनमें न्याय की भावना नहीं है। क्योंकि, यदि अल्पसंख्यक शव का बंटवारा कर रहे हैं, तो स्वयं श्री गांधी क्या कर रहे हैं? वह भी शव का बंटवारा करने में जुटे हुए हैं। श्री गांधी और अल्पसंख्यकों में केवल यह अंतर है µ श्री गांधी चाहते हैं कि शव का बंटवारा केवल तीन, यानी हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों के बीच किया जाए। अल्पसंख्यक चाहते हैं कि दूसरों को भी उसमें हिस्सा मिले। इन दोनों पक्षों में से कौन यह दावा कर सकता है कि न्याय उसके पक्ष में है, क्या श्री गांधी जो चाहते हैं कि शव का बंटवारा हट्टे-कट्टे, मोटे-ताजे भेडि़यों के बीच हो या अल्पसंख्यकों के जो आग्रह कर रहे हैं कि पतले-दुबले, भूखे मैमनों को भी कोई ग्रास मिल जाए? निश्चय ही इस विवाद में न्याय श्री गांधी के पक्ष में नहीं है।
श्री गांधी ऐसे व्यक्ति हैं, जो यह दावा करते हैं कि स्वयं अस्पृश्यों के अपने प्रतिनिधियों के मुकाबले वह उनके कहीं बेहतर प्रतिनिधि और पक्षधर हैं। कहां पक्षधर होने का उनका दावा और कहां नैतिकता, न्याय और जरूरत को ताक पर रखकर प्रतिनिधित्व संबंधी अस्पृश्यों की मांग को उनके द्वारा ठुकराया जाना जो सामाजिक अत्याचार और सामाजिक दमन से उनकी सुरक्षा का एकमात्र उपाय हो सकता है, जब कि वह मुसलमानों, हिंदुओं और सिखों को राजनीतिक सत्ता का अच्छा-खासा हिस्सा देने के लिए तैयार हैं। जहां कहीं बेहतर स्थिति वाले अन्य लोग सत्ता की मांग कर रहे हैं, वहां श्री गांधी चाहते हैं कि बिना किसी सुरक्षा के अस्पृश्य उनकी तथा कांग्रेस की छत्रछाया में रहें, जब कि वह भली-भांति जानते हैं कि अस्पृश्यों के सिर पर तो हर पल खतरे और अपमान की नंगी तलवार लटकती रहती है। जब श्री गांधी को पता चला कि अस्पृश्य अपनी मांग के समर्थन में बाहरी मदद प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं, तो उन्होंने विश्वासघात के भंयकर हथियार का सहारा लिया। जब श्री गांधी गोलमेज सम्मेलन में भाग लेकर बंबई पहुंचे तो क्या अस्पृश्यों ने कोई अनुचित कार्य किया जब उन्होंने दुनिया के सामने श्री गांधी के विरुद्ध अपना आरोप-पत्र प्रस्तुत किया?