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सभ्यता या घोर असभ्यता

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सकते थे, वे भी इस धंधे में मदद करते थे। वे पहरेदारी या जासूसी करते थे या रसोइए का काम करते थे। उनका एक भरा-पूरा संगठन होता था। वे इसी कारण गुप्त रूप से और सुरक्षापूर्वक काम करते थे। ये मुख्यतः धार्मिक वेश में रहते थे, जिसके कारण ये हत्याएं करने पर भी अपने को बचा लेते थे। इसी कारण वे सदियों लूटपाट का अपना यह धंधा चलाते रहे। विशेष बात यह थी कि भारत के शासक, चाहे वे हिंदू थे या मुसलमान ‘ठगी’ को नियमित धंधा मानते थे। ठग राज्य को हमेशा कर देते थे और राज्य की ओर से उनके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होती थी।

जब अंग्रेज देश के शासक बने, तभी ठगों के दमन का प्रयास किया गया। 1835 तक 382 ठगों को फांसी दी गई और 986 को जीवन-भर काले पानी भेज दिया गा या आजन्म कैद की सजा दी गई। तो भी 1879 तक 344 ठग पंजीकृत थे और 1904 तक भारत सरकार का ठगी तथा डकैती से संबंधित विभाग काम करता रहा। 1904 में उसका स्थान केंद्रीय खुफिया विभाग ने ले लिया।

हालांकि इन पेशेवर अपराधियों को, जो बेरोक-टोक अपना पेशा चलाते थे, अब कुचल दिया गया है ओर वे अब लूटमार और शांति-व्यवस्था को भंग नहीं कर सकते, तो भी भारत में अब भी ऐसी जातियां हैं जो जरायम-पेशा हैं। इनकी सूची सरकार ने जरायम-पेशा जातियों के रूप में बनाई हुई है।

जरायम-पेशा जातियों के लोग मैदानी इलाकों में सभ्य जातियों के लोगों के बीच में भले ही नहीं रहते हैं, लेकिन वे उनके आसपास तो रहते ही हैं। वे संगठित रूप से डकैती और लूटपाट कर अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं। इस कारण उन्हें भारत सरकार ने जरायम-पेशा जातियों के रूप में निषिद्ध घोषित कर रखा है। होलियस ने अपनी पुस्तक ‘क्रिमिनल ट्राइब्स आQ दि यूनाइटेड प्रोविंसेज’ में उनके कार्यकलापों का ब्यौरा दिया है। जुर्म करना ही उनकी रोजी है। उनमें से कुछ दिखावे के लिए भले ही खेती करते हों, पर वह तो असलियत को ढकने का सिर्फ एक बहाना है। उनका धंधा मुख्यतः डकैती और लूटपाट करना है। चूंकि उनकी जाति का पेशा ही जरायम है, इसलिए वे इसे बुरा नहीं समझते। जब वे किसी खास इलाके में डाका डालने की योजना बनाते हैं तो वे सही शिकार की खोज करने, गांव वालों के व्यवहार को देखने-समझने, गांव वालों को मिलने वाली मदद का स्रोत व उसका परिणाम, बंदूकों आदि की संख्या का अनुमान लगाने के लिए जासूस भेजते हैं। ये डाके प्रायः मध्यरात्रि में डाले जाते हैं। जासूसों की सूचना के आधार पर गांव के विभिन्न स्थानों पर वे अपने आदमी तैनात कर देते हैं। ये लोगों का ध्यान बांटने के लिए गोली चलाते हैं और तब मुख्य टोली पहले से नियत घर अथवा घरों पर हमला कर देती है। टोली प्रायः 30 या 40 लोगों की होती है।