11. गांधी और उनका अनशन - Page 251

236 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

थे और उन्हीं के मनोनीत व्यक्ति थे। दुनिया के सामने ढोल पीटा गया कि वह श्री गांधी के आगमन की प्रतीक्षा करें और वायदा किया गया कि अपनी राजनीतिक सूझबूझ के बल पर श्री गांधी इस विवाद का निपटारा कर सकेंगे। अंतः श्री गांधी के मित्रों के लिए यह बड़े शर्म की बात थी कि श्री गांधी ने अपने दिवालिएपन को स्वीकार किया और प्रधानमंत्री से किए गए मध्यस्था के अनुरोध में वह भी शामिल हो गए।

लेकिन यदि सम्मेलन विफल हो गया तो उसका पूरा दोष श्री गांधी का है। सम्मेलन तो ऐसे संविधान की रूपरेखा प्रस्तुत करने के लिए बुलाया गया था, जो भारत के विविध प्रकार के हितों में समन्वय स्थापित कर सके। ऐसे सम्मेलन के लिए श्री गांधी से अधिक अनुभवहीन और अकुशल प्रतिनिधि नहीं भेजा जा सकता था। संवैधानिक विधि अथवा वित्त के बारे में श्री गांधी का ज्ञान शून्य के बराबर था। वह बौद्धिक योग्यता में विश्वास नहीं रखते। वस्तुतः उसके प्रति उनमें असीम घृणा है। अतः अनेक कठिनाइयों के समाधान के प्रति उनका योगदान शून्य के बराबर है। वह व्यवहार-कुशल नहीं थे। उन्होंने तो प्रायः सभी प्रतिनिधियों को नाराज कर दिया। उनसे वह बार-बार यही कहते रहे कि वे तो नगण्य व्यक्ति थे। अकेले वही महत्वपूर्ण व्यक्ति थे और अपेक्षाओं की कसौटी पर खरे उतर सकते थे। प्रथम गोलमेज सम्मेलन में प्रतिनिधि सांप्रदायिक समस्या के किसी हल के बारे में सहमत नहीं हो सके थे। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि वे सहमति के अति निकट पहुंच गए थे और जब वे अलग हुए तो उन्होंने सहमति की आशा नहीं छोड़ी थी। लेकिन दूसरे गोलमेज सम्मेलन के समापन पर श्री गांधी ने इतना मनमुटाव पैदा कर दिया था कि आपसी सुलह का कोई मौका ही नहीं रह गया था। तब मध्यस्था के अलावा और कोई चारा ही नहीं रह गया था।

सांप्रदायिक मसले पर प्रधानमंत्री के निर्णय की घोषणा 17 अगस्त, 1932 को की गई। जहां तक निर्णय की शर्तों का संबंध अस्पृश्यों से है, वे इस प्रकार हैं ख्1, ः

महामहिम की सरकार, 1932 द्वारा लिया गया

सांप्रदायिक निर्णय

विगत पहली दिसंबर को गोलमेज सम्मेलन के दूसरे सत्र के समापन पर

महामहिम की सरकार की ओर से प्रधानमंत्री ने एक वक्तव्य दिया और उसके

तुरंत पश्चात् संसद के दोनों सदनों ने उसका अनुमोदन किया। उसमें यह स्पष्ट

  1. सांप्रदायिक निर्णय का निम्न पाठ मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में टंकित नहीं है। इसे लेखक की कृति,

‘व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू दि अनटचेबिल्स’, पृ. 80µ82 से यह उद्धृत किया गया है।