11. गांधी और उनका अनशन - Page 252

गांधी और उनका अनशन

237

कर दिया गया है कि जिन सांप्रदायिक मसलों को हल करने में सम्मेलन विफल रहा, यदि उनके बारे में भारत के संप्रदाय सभी पक्षों को स्वीकार्य कोई समझौता न कर सकें, तो महामहिम की सरकार का इस बारे में दृढ़ संकल्प है कि उसके कारण भारत की संवैधानिक प्रगति अवरुद्ध नहीं होनी चाहिए और वह स्वयं दिमाग लड़ाकर और जुगत भिड़ाकर एक अस्थाई योजना के द्वारा इस बाधा को दूर करेगी।

  1. जब महामहिम की सरकार को यह सूचना मिली कि किसी समझौते पर पहुंचने में संप्रदाय लगातार विफल रहे हैं और उससे एक नए संविधान की संरचना संबंधी योजनाओं की प्रगति में बाधा पड़ रही है, तो उसने विगत 19 मार्च को कहा कि वह उत्पन्न होने वाले कठिन तथा विवादास्पद मसलों पर सावधानी से पुनर्विचार कर रही है। वह अब इस बारे में संतुष्ट हो गई है कि संविधान की संरचना में आगे प्रगति तभी हो सकती है, जब नए संविधान के अधीन अल्पसंख्यकों की स्थिति से संबद्ध समस्याओं के कम से कम कुछ पहलुओं के बारे में कोई निर्णय हो जाए।

  2. तदनुसार महामहिम की सरकार ने निर्णय किया है कि वह ऐसे उपबंधों को शामिल करेगी, जो यथासमय संसद के समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले भारतीय संविधान से संबद्ध प्रस्तावों में निम्नांकित योजना को कार्यरूप देंगे। इस योजना के क्षेत्र को जान-बूझकर उन प्रबंधों तक सीमित रखा गया है, जो प्रांतीय विधान-मंडलों में ब्रिटिश भारत के संप्रदायों के प्रतिनिधित्व के बारे में किए जाएंगे। केंद्रीय विधान-मंडल में प्रतिनिधित्व का विचार नीचे पैरा 20 में दिए गए कारण से स्थगित कर दिया गया है। योजना के क्षेत्र को सीमित रखने का अर्थ यह नहीं है कि वह यह अनुभव नहीं करती कि संविधान की संरचना में अल्पसंख्यकों के लिए अति महत्वपूर्ण अनेक अन्य समस्याओं पर निर्णय की जरूरत पड़ेगी, अपितु उसने यह निर्णय इस आशा से किया है कि जब एक बार प्रतिनिधित्व की पद्धति और अनुपात के बुनियादी प्रश्नों के बारे में घोषणा कर दी जाएगी, तो हो सकता है कि संबंधित संप्रदाय स्वयं उन अन्य सांप्रदायिक मसलों के बारे में कोई अस्थाई व्यवस्था खोज लें, जिन पर वे अपेक्षित स्तर का विचार नहीं कर सके हैं।

  3. महामहिम की सरकार चाहती है कि उसकी बात को अति स्पष्ट रूप से समझ लिया जाए कि वह स्वयं किसी ऐसी वार्ता में भाग नहीं ले सकती जो उसके निर्णय में परिवर्तन के लिए की जाए और न ही वह किसी ऐसे अभ्यावेदन पर विचार करने के लिए तैयार होगी जिसका लक्ष्य उसमें परिवर्तन करना हो और जिसे सभी संबद्ध पक्षों का समर्थन प्राप्त न हो। लेकिन उसकी हार्दिक इच्छा है कि यदि राजी-खुशी से कोई सर्वसम्मत समझौता हो सके तो उसके लिए द्वार