238 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
खुला रहे। अतः यदि नए भारत सरकार अधिनियम को कानूनी दर्जा मिलने से पूर्व उसे इस बारे में संतोष हो जाए कि संबद्ध संप्रदाय गवर्नरों के किसी एक या उससे अधिक प्रांतों के बारे में अथवा समूचे ब्रिटिश भारत के बारे में किसी व्यावहारिक वैकल्पिक योजना पर आपस में सहमत हो गए हैं, तो वह संसद से यह सिफारिश करने के लिए तैयार हो जाएगी कि इस समय जिन उपबंधों की रूपरेखा तैयार की गई है, उसके स्थान पर वैकल्पिक योजना को रखा जाएः 5. * * * * * 6. * * * * * 7. * * * * * 8. * * * * *
- वोट की योग्यता वाले ‘दलित वर्गों’ के लोग सामान्य निर्वाचन-क्षेत्र में वोट देंगे। लेकिन इस बात को ध्यान में रखते हुए कि काफी अर्से तक इस बात की संभावना नहीं है कि इन वर्गों को केवल इसी उपाय से विधान-मंडल में पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त हो सकेगा, उन्हें सारणी में दर्शाई गई संख्या के अनुसार विशेष सीटें दी जाएंगी। ये सीटें विशेष निर्वाचन-क्षेत्रों में होने वाले चुनाव से भरी जाएंगी। इन निर्वाचन-क्षेत्रों में मतदान की योग्यता पाने वाले केवल ‘दलित वर्गों’ के लोग ही वोट डाल सकेंगे। जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, ऐसे विशेष निर्वाचन-क्षेत्र में भी वोट डालने वाले व्यक्ति को यह अधिकार भी होगा कि वह सामान्य निर्वाचन-क्षेत्र में भी वोट डाल सकेगा। उद्देश्य यह है कि इन निर्वाचन-क्षेत्रों का गठन न खास क्षेत्रों में किया जाए जहां दलित वर्गों का बाहुल्य हो, और मद्रास को छोड़कर अन्यत्र उनकी व्यवस्था प्रांत के समूचे क्षेत्र के लिए न की जाए।
बंगाल में इस बात की संभावना दीख पड़ती है कि कुछ सामान्य निर्वाचन-क्षेत्रों में अधिकांश मतदाता दलित वर्गों के होंगे। तदनुसार और छानबीन होने तक उस प्रांत में दलित वर्गों के विशेष निर्वाचन-क्षेत्रों से चुने जाने वाले सदस्यों की कोई संख्या निश्चित नहीं की गई है। उद्देश्य यह है कि दलित वर्ग बंगाल के विधान-मंडल में 10 से कम सीटें प्राप्त न करें। इस बारे में अभी तक अंतिम रूप से निश्चय नहीं किया गया है कि हर प्रांत मे उन लोगों की ठीक-ठाक परिभाषा क्या होगी, जो (यदि मतदान के योग्य हों) दलित वर्गों के बीच विशेष निर्वाचन-क्षेत्रों में वोट डालने के अधिकारी होंगे। सामान्यतः वह परिभाषा उन सामान्य सिद्धांतों पर आधारित होगी, जिनकी सिफारिश मताधिकार कमेटी की रिपोर्ट में की गई है।