गांधी और उनका अनशन
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लेकिन उत्तरी भारत के कुछ प्रांतों में परिवर्तन की जरूरत पड़ सकती है। वहां
अस्पृश्यता की सामान्य कसौटी को लागू करने से ऐसी परिभाषा बन सकती है,
जो किन्हीं दृष्टियों से प्रांत की विशेष परिस्थितियों के अनुकूल न हों।
महामहिम की सरकार का विचार है कि दलित वर्गों के लिए इन विशेष
निर्वाचन-क्षेत्रों की आवश्यकता सीमित समय से अधिक के लिए नहीं पड़ेगी। वह
चाहती है कि निश्चय ही संविधान यह व्यवस्था करेगा कि 20 वर्षों के पश्चात्
वे समाप्त हो ही जाएंगे, यदि उससे पूर्व उनका उन्मूलन पैरा 5 में उल्लिखित
निर्वाचन संशोधन की सामान्य शक्तियों के अधीन न कर दिया जाए।
जहां तक अन्य अल्पसंख्यक संप्रदायों का संबंध है, सांप्रदायिक निर्णय को स्वीकार कर लिया गया है और फूट तथा मन-मुटाव के अप्रिय विषय को समाप्त कर दिया गया है। लेकिन जहां तक अस्पृश्यों का संबंध है, वह अब भी बना हुआ है। श्री गांधी को ब्रिटिश सरकार ने जेल में डाल दिया। पर भले ही श्री गांधी यरवदा जेल में हैं, वह यह नहीं भूले हैं कि ब्रिटिश सरकार द्वारा मान्य विशेष प्रतिनिधित्व संबंधी अस्पृश्यों की मांग को वह पूरा नहीं होने देंगे। उन्हें आशंका है कि ब्रिटिश सरकार अस्पृश्यों को यह अधिकार दे सकती है। वह गोलमेज सम्मेलन में दी गई उनकी इस धमकी की भी परवाह नहीं करेगी कि वह अपने प्राणों की बाजी लगाकर उसका विरोध करेंगे। अंततः उन्होंने शीघ्र अति-शीघ्र अवसर मिलते ही उसी ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखा, जिसने उन्हें बंदी बना लिया है।
श्री गांधी ने 11 मार्च, 1932 को तत्कालीन भारत मंत्री सर सैमुएल होर को यह पत्र लिखाः
प्रिय सर सैमुएल,
शायद आपको याद होगा कि जब गोलमेज सम्मेलन में अल्पसंख्यकों की
मांग प्रस्तुत की गई थी, तो अपने भाषण के अंत में मैंने कहा था कि दलित
वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन-मंडल की व्यवस्था का विरोध मुझे अपने प्राणों
की बाजी लगाकर करना चाहिए। मैंने ऐसा क्षणिक आवेश में या वक्तृता झाड़ने
के लिए नहीं किया था। वह एक गंभीर वक्तव्य था। उस वक्तव्य के अनुसार
मैं आशा करता था कि भारत लौटने पर मैं कम-से-कम दलित वर्गों के लिए
पृथक निर्वाचन-मंडलों के विरोध में जनमत तैयार करूंगा। लेकिन वैसा नहीं
कर सका।
समाचार-पत्रों में मैंने पढ़ा है, मुझे लगता है कि किसी भी क्षण महामहिम की
सरकार अपने निर्णय की घोषणा कर सकती है। पहले तो मैंने सोचा कि यदि