गांधी और उनका अनशन
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महामहिम की सरकार को सूचित करता हूं कि यदि उनका निर्णय दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन-मंडलों के गठन का होगा, तो निश्चय ही मैं आमरण अनशन करूंगा।
मैं बड़े ही व्यथित मन से इस तथ्य के बारे में सजग हूं कि जेल में रहते हुए मेरा ऐसा कदम निश्चय ही महामहिम की सरकार को गंभीर परेशानी में डालेगा। अनेक लोग इसे इस दृष्टि से अति अनुचित मानेंगे कि मेरी जैसी हैसियत वाला कोई व्यक्ति राजनीतिक क्षेत्र में ऐसे उपायों का सूत्रपात करे, जिन्हें वे कम-से-कम सनक भरे तो कहेंगे ही। बचाव में मैं बस इतना ही कह सकता हूं कि मेरे लिए विचारित कदम उपाय नहीं हैं, वह तो मेरे अस्तित्व का हिस्सा हैं। यह तो मेरी अंतरात्मा की आवाज है और मैं उसकी अनसुनी नहीं कर सकता, भले ही उसके लिए मुझे विवेक संबंधी अपनी पूरी प्रतिष्ठा को गंवाना पड़े। अब जहां तक मैं देख सकता हूं, जेल से मेरी रिहाई भी अनशन के मेरे कर्तव्य को कम अनिवार्य नहीं बनाएगी। लेकिन मैं आशा कर रहा हूं कि मेरी सभी आशंकाएं पूर्णतया अनुचित हैं और ब्रिटिश सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है कि वह दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन-मंडलों का गठन करेगी।
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भारत मंत्री ने श्री गांधी को यह उत्तर दिया थाः
इंडिया आफिस, व्हाइट हाल,
13 अप्रैल, 1932
प्रिय श्री गांधी,
मैं दिनांक 11 मार्च के आपके पत्र का उत्तर दे रहा हूं। मैं तुरंत कहता हूं कि दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन-मंडलों के मसले पर आपकी भावना की तीव्रता को मैंने पूर्णतया अनुभव कर लिया है। मैं केवल यह कह सकता हूं कि हम ऐसा निर्णय देना चाहते हैं, जो पूर्णतया केवल मामले के गुण-दोषों को देखते हुए आवश्यक हो। जैसा कि आपको मालूम है, लार्ड लोथियन की कमेटी ने अभी अपना दौरा पूरा नहीं किया है और निश्चय ही कुछ सप्ताह बाद ही हम उससे कोई निष्कर्ष प्राप्त कर सकते हैं। जब वह रिपोर्ट हमें मिलेगी तो हमें उसकी सिफारिशों पर अति सावधानी से विचार करना होगा। हम कोई निर्णय तभी देंगे, जब हम न केवल कमेटी के दृष्टिकोण पर, बल्कि उन दृष्टिकोणों पर भी विचार कर लेंगे, जो अपने और आपकी विचारधारा वालों ने इतने सशक्त ढंग से