242 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
व्यक्त किए हैं। मुझे पूरा यकीन है कि यदि आप हमारी स्थिति में होते तो आप
ठीक वही कदम उठाते, जो हम उठाना चाहते हैं। आप कमेटी की रिपोर्ट की
प्रतीक्षा करेंगे और फिर आप उस पर पूरी तरह विचार करेंगे और किसी अंतिम
निर्णय पर पहुंचने से पहले आप उन दष्टिकोणों को ध्यान में रखेंगे, जो विवाद
के पक्ष और विपक्ष में व्यक्त किए गए हैं।
इससे अधिक मैं नहीं कह सकता। वस्तुतः मैं इसकी कल्पना भी नहीं करता
कि आप मुझसे इससे अधिक कहने की उपेक्षा करेंगे।
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यह चेतावनी देकर श्री गांधी निशि्ंचत होकर बैठ गए। उन्होंने सोचा कि ब्रिटिश सरकार को पंगु बनाने के लिए आमरण अनशन की उनकी दुबारा दी गई धमकी पर्याप्त होगी और वह विशेष प्रतिनिधित्व की अस्पृश्यों की मांग को स्वीकार नहीं करेगी। जब 17 अगस्त, 1932 को सांप्रदायिक निर्णय की शर्तों की घोषणा कर दी गई, तो श्री गांधी को पता चला कि उनकी धमकी का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। पहले तो उन्होंने ‘सांप्रदायिक निर्णय’ की शर्तों को बदलवाने का प्रयास किया। तद्नुसार उन्होंने प्रधानमंत्री को निम्न पत्र लिखाः
यरवदा सेंट्रल जेल,
18 अगस्त, 1932
प्रिय मित्र,
इस बारे में कोई संदेह नहीं हो सकता कि दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व
के मसले पर 11 मार्च को जो पत्र मैंने सर सैमुएल होर को लिखा था, उन्होंने
उसे आपको इस मंत्रिमंडल को दिखा दिया है। उस पत्र को इस पत्र का हिस्सा
समझा जाए और उसे इसके साथ पढ़ा जाए।
अनशन का निर्णय
अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व के बारे में मैंने ब्रिटिश सरकार के निर्णय को
पढ़ा है और मैं उसके बारे में निश्चिंत हो गया हूं। सर सैमुअल होर को लिखे
गए अपने पत्र के अनुसार तथा 13 नवंबर, 1931 को सेंट जेम्स पैलेस में
गोलमेज सम्मेलन की अल्पसंख्यकों संबंधी समिति की बैठक में की गई अपनी
घोषणा के अनुसार मुझे अपने प्राणों की बाजी लगाकर आपके निर्णय का प्रतिरोध
करना है। ऐसा मैं केवल आमरण अनशन की घोषणा करके ही कर सकता हूं।
इससे मैं नमक और सोडा सहित अथवा रहित जल के अलावा किसी प्रकार का