गांधी और उनका अनशन
243
अन्न ग्रहण नहीं करूंगा। यह अनशन समाप्त कर दिया जाएगा, यदि इसके दौरान ब्रिटिश सरकार अपने निजी प्रस्ताव द्वारा अथवा जनमत दबाव के अधीन अपने निर्णय को बदल दे और दलित वर्गों के लिए सांप्रदायिक निर्वाचक-मंडलों की अपनी योजना को वापस ले ले। दलित वर्गों के प्रतिनिधि सामान्य निर्वाचन-क्षेत्रों से समान मताधिकार के अधीन चुने जाएं, भले ही वह कितना भी व्यापक हो।
प्रस्तावित अनशन सामान्यतः अगले मास 20 सितंबर की दोपहर से प्रारंभ कर दिया जाएगा, यदि इस बीच उपरोक्त सुझाव के अनुसार उक्त निर्णय में परिवर्तन नहीं कर दिया जाता।
मैं यहां अधिकारियों से अनुरोध कर रहा हूं कि वे समुद्री तार (केबिल) द्व ारा इस पत्र का मूलपाठ आपके पास भेज दें, ताकि आपको पर्याप्त पूर्व-सूचना मिल जाए। लेकिन बहरहाल मैं इस पत्र के लिए इतना काफी समय दे रहा हूं कि वह मंद-से-मंद साधन से भी आपके पास समय से पहुंच जाए।
मैं यह अनुरोध भी करता हूं कि इस पत्र को तथा सर सैमुएल होर के नाम मेरे पूर्वोक्त पत्र को यथासंभव प्रकाशित कर दिया जाए। मैंने जेल के नियमों का कठोरता से पालन किया है और अपने दो साथियों को छोड़कर अन्य किसी को भी अपनी इच्छा अथवा दोनों पत्रों की विषय-वस्तु नहीं बताई है। वे साथी हैं, सरदार वल्लभभाई पटेल और श्री महादेव देसाई। लेकिन मैं चाहता हूं, यदि आप इसे कर सकें, कि जनमत पर मेरे पत्रों का प्रभाव पड़े। अतः मेरा अनुरोध है कि उनका शीघ्र प्रकाशन किया जाए।
रिहाई से काम नहीं चलेगा
मैंने व्यथा के साथ यह निर्णय लिया है। लेकिन धर्मप्राण व्यक्कित के नाते मेरे पास और कोई चारा नहीं रह गया है। जैसा कि मैं सर सैमुएल होर को अपने पत्र में लिख चुका हूं, भले ही महामहिम की सरकार परेशानी से बचने के लिए मुझे रिहा कर देने का निर्णय कर ले, पर मेरा अनशन जारी रहेगा, क्योंकि अब मुझे आशा नहीं है कि किसी अन्य उपाय से इस निर्णय का प्रतिरोध कर सकूंगा। और अब मेरे मन में तनिक भी इच्छा नहीं है कि सम्मानजनक ढंग के अलावा किसी अन्य उपाय से रिहाई प्राप्त करूं।
हो सकता है कि मेरा निर्णय विकृत हो और मेरी यह मान्यता पूर्णतया गलत हो कि दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन-मंडल उनके तथा हिंदू धर्म, दोनों के लिए हानिकर हैं। यदि ऐसा होगा तो मैं अपने जीवन-दर्शन के अन्य अंगों के प्रति न्याय नहीं कर सकूंगा। उस अवस्था में अनशन द्वारा मेरी मौत तुरंत