1. सभ्यता या घोर असभ्यता - Page 27

12 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इन जातियों के आम जीवन में जुर्म जो महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, यहां उस पर बल देना अति आवश्यक है। बच्चा जैसे ही चलने और बोलने लायक हो जाता है, उसे जुर्म करने की शिक्षा दी जानी शुरू हो जाती है। निस्संदेह यह उद्देश्य बहुत ही उपयोगी सिद्ध होता है, क्योंकि छोटी-मोटी चोरी के लिए बच्चों को इस्तेमाल करने में कोई बड़ा जोखिम नहीं होता। यदि कोई बच्चा पकड़ा भी जाएगा तो वह दो-चार तमाचे खाकर छूट जाता है और अगर वह बड़ा हुआ तो उसके फौरन गिरफतार होने की शंका रहती है। औरतें भी काफी अहम भूमिका अदा करती हैं। भले ही वे इन कामों में हिस्सा न लें, पर उन पर अनेक भारी जिम्मेदारियां होती हैं। वे चुराए गए अधिकांश माल को तो ठिकाने लगाती ही हैं, साथ ही वे दुकानों से चीजें उड़ाने में भी माहिर होती हैं।

जरायम-पेशा जातियों की तरह ही अस्पृश्य वर्ग भी सभ्य हिंदू समाज के बीच रहते हैं, पर अस्पृश्यों की संस्कृति और उनके आचार-विचार उन्हें आदिम जातियों तथा जरायम-पेशा जातियों से एकदम अलग करते हैं। अस्पृश्यों ने हिंदू जाति की संस्कृति को अपनाया है। वे हिंदू जाति के धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। वे हिंदुओं की धार्मिक तथा सामाजिक परंपराओं का आदर करते हैं। वे हिंदुओं के तीज-त्योहार मनाते हैं। लेकिन उन्हें इसका कोई लाभ नहीं मिलता। उल्टे उनसे दुराव और अलगाव किया जाता है। क्योंकि हिंदू मानते हैं कि अस्पृश्यों के स्पर्श से वे भ्रष्ट हो जाते हैं, अतः उन प्रयोजनों को छोड़कर जो अस्पृश्यों के बिना पूरे नहीं हो सकते है, उनके साथ हर प्रकार का सामाजिक व्यवहार निषिद्ध होता है। वे गांव के बीच नहीं रहते। वे गांव के बाहर रहते हैं। हर गांव का अपना एक इलाका होता है, जो अस्पृश्य होता है, वह गांव से जुड़ा तो होता है, पर गांव का हिस्सा नहीं होता। शेष हिंदुओं से अलग-थलग उन्हें एक ऐसी आचरण-संहिता से जकड़ दिया जाता है, जो दासों के लिए ही उपयुक्त होती है। इस संहिता के अनुसार अस्पृश्य ऐसा कुछ नहीं कर सकता, जो उसे जीवन के नियत स्तर से ऊपर उठा सके। उसे अपने दर्जे से ऊंचे स्तर के कपड़े नहीं पहनने चाहिएं और न ही किसी अस्पृश्य महिला को अपने से ऊंचे वर्ग की हिंदू महिलाओं के जेवरों जैसे जेवर पहनने चाहिएं। गांव के शेष हिंदुओं के घरों के मुकाबले उसका घर बेहतर या बड़ा नहीं होना चाहिए। बहरहाल, उसके घर पर खपरैल की छत तो होनी ही नहीं चाहिए। निश्चय ही अस्पृश्य को हिंदू के सामने बैठना नहीं चाहिए और उसका उसे हमेशा पहले अभिवादन करना चाहिए। निश्चय ही अस्पृश्य का न तो साफ वस्त्र पहनने चाहिएं और न ही पीतल या तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल करना चाहिए। उसे चांदी या सोने के जेवर भी नहीं पहनने चाहिएं। जब हिंदू के परिवार में कोई मौत हो जाए तो अस्पृश्य को उस परिवार के रिश्तेदारों को मौत की खबर देने के लिए जाना चाहिए, भले ही वे कितनी दूर क्यों न