248 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ऐसी व्याख्या की, जिसकी मैंने कभी कल्पना तक नहीं की। मैंने उसी वर्ग की ओर से बोलने का दावा किया है, जिनके बारे में आपने लांछन लगाया है कि उनके हितों की बलि चढ़ाने के लिए मैं आमरण अनशन करना चाहता हूं। मैंने आशा की थी कि बिना किसी तर्क-वितर्क के ऐसे अतिवादी कदम से ही ऐसी किसी स्वार्थभरी व्याख्या को रोका जा सकेगा। मैं पुनः जोर देकर कहता हूं कि मेरी दृष्टि में यह मामला विशुद्ध धार्मिक मामला है। दलित वर्गों को दो स्थानों पर वोट का अधिकार मिल जाएगा, केवल इस तथ्य से न तो उन्हें संरक्षण मिल जाएगा और न ही वृहत् हिंदू समाज टूटने से बच पाएगा। दलित वर्गों के लिए यदि किसी पृथक निर्वाचक-मंडल का गठन किया जाना है तो वह मुझे जहर का ऐसा इंजेक्शन दीख पड़ता है, जो हिंदू धर्म को तो नष्ट करेगी ही, साथ ही उससे दलित वर्गों का भी रंचमात्र हित नहीं होगा। आप मुझे यह कहने की अनुमति देंगे कि भले ही आप कितनी भी सहानुभूति रखते हों, पर आप संबद्ध पक्षों के लिए ऐसे अति महत्वपूर्ण तथा धार्मिक महत्व के मामले पर कोई ठीक निर्णय नहीं ले सकते।
दलित वर्गों को अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व दिए जाने का भी मैं विरोध नहीं करना चाहूंगा। पर मैं चाहूंगा कि जब तक दलित वर्ग हिंदू परिधि में रहना चाहें, तब तक उससे सीमित मात्रा में भी उनका कानूनी विच्छेद न हो। क्या आप यह अनुभव करते हैं कि यदि आपका निर्णय बरकरार रहता है और संविधान बनता है, तो आप हिंदू सुधारकों के कार्य की अद्भुत प्रगति को अवरुद्ध कर देंगे। हिंदू सुधारक तो सदा ही जीवन के हर क्षेत्र में अपने दलित बंधुओं के उत्थान के लिए समर्पित रहे हैं।
निर्णय अडिग
अतः मैं अनिच्छा से विवश हो गया हूं कि आपको प्रेषित निर्णय पर अटल रहूं।
चूंकि आपके पत्र से कुछ गलतफहमी पैदा हो सकती है, अतः मैं कहना चाहता हूं कि दलित वर्गों के मामले को विशेष व्यवहार के लिए मैंने उसे आपके निर्णय के अन्य भागों से अलग कर लिया है। उसका कदापि यह अर्थ नहीं है कि मैं आपके निर्णय के अन्य भागों पर अनुमोदन करता हूं या उनसे सहमत हूं। मेरी राय में अन्य अनेक भागों पर भी अति गंभीर आपत्ति की जा सकती है। केवल मेरा विचार यह है कि वे मुझसे यह अपेक्षा नहीं करते कि मैं वैसा आत्म-बलिदान करूं, जिसकी प्रेरणा मुझे मेरी अंतरात्मा ने दलित वर्गों के मामले में दी है।
आपका स्नेही मित्र,
एम.के. गांधी