गांधी और उनका अनशन
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तदनुसार 20 सितंबर, 1932 को श्री गांधी ने अस्पृश्यों के लिए पृथक निर्वाचक-मंडलों की व्यवस्था के विरोध में अपना ‘आमरण अनशन’ प्रारंभ कर दिया।
इस अनशन की गाथा का गुणगान श्री प्यारे लाल ने अपनी पुस्तक ‘दि एपिक फास्ट’ में किया है। कैसा भड़कीला और रंगीन नाम! इस चटपटी जीवनी के पन्नों में जिज्ञासु को वह सब मिलेगा, जो वह भारत के इन उन्मादपूर्ण दिनों की घटनाओं के बारे में जानना चाहता है। यहां मैं उसके बारे में कुछ नहीं कहना चाहता। इतना कहना काफी होगा कि भले ही श्री गांधी ने आमरण अनशन किया, पर वह मरना नहीं चाहते थे। वह तो जिंदा रहना चाहते थे।
अतः अनशन से समस्या पैदा हो गई और वह समस्या यह थी कि श्री गांधी के जीवन को कैसे बचाया जाए। उनके जीवन को बचाने के लिए केवल एक ही तरीका था कि ‘सांप्रदायिक निर्णय’ में परिवर्तन कर दिया जाए, ताकि श्री गांधी की अंतरात्मा को ठेस न पहुंचे। प्रधानमंत्री ने यह तो बिल्कुल स्पष्ट रूप से कह दिया था कि ब्रिटिश मंत्रिमंडल न तो स्वयं उसे वापस लेगा और न ही उसमें परिवर्तन करेगा, पर वह इस बात के लिए तैयार था कि उसके स्थान पर एक ऐसा सूत्र रखा जा सकता है जिसके बारे में सवर्ण हिंदू और अस्पृश्य, दोनों सहमत हों। चूंकि गोलमेज सम्मेलन में मुझे अस्पृश्यों को प्रतिनिधित्व करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था, अतः यह मान लिया गया कि अस्पृश्यों की सहमति तभी वैध होगी जब मैं भी उसका पक्षधर बनूं। उस समय भारत के अस्पृश्यों के प्रतिनिधि के रूप में मेरी स्थिति पर न केवल कोई आपत्ति नहीं उठाई अपितु उसे तथ्य के रूप में स्वीकार किया गया। स्वाभाविक था कि सभी की निगाहें इस नाटक के नायक अथवा यूं करें कि खलनायक के रूप में मुझ पर स्थिर हो गईं। जैसा कि स्वयं गांधी ने कहा था कि उनका जीवन तो मेरे हाथ में है।
इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि उस समय मैं किसी भी अन्य व्यक्ति की अपेक्षा एक महान तथा गंभीर धर्मसंकट में फंस गया था। बड़ी ही विकट स्थिति थी। मुझे दो परस्पर विरोधी विकल्पों में से एक को चुनना था। एक ओर मानवता के नाते मेरा कर्तव्य था कि निश्चित मृत्यु से श्री गांधी के प्राणों की रक्षा करूं। दूसरी ओर अस्पृश्यों के लिए उन राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करने की समस्या थी, जिन्हें प्रधानमंत्री ने उन्हें दिया था। मैंने मानवता की पुकार को सुना और श्री गांधी के प्राणों की रक्षा की। मैं इसके लिए सहमत हो गया कि सांप्रदायिक निर्णय में उस प्रकार संशोधन कर दिया जाए जिससे श्री गांधी को संतोष हो जाए। इस समझौते को पूरा समझौता कहा जाता है।
पूना समझौते की शर्त इस प्रकार थीः