गांधी और उनका अनशन
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पश्चात् समाप्त हो जाएगी, यदि उससे पहले निम्न खंड 6 के उपबंध के अधीन
उसे आपसी समझौते द्वारा समाप्त न कर दिया जाए।
- प्रांतीय तथा केंद्रीय विधान-मंडलों में आरक्षित सीटों द्वारा दलित वर्गों
के प्रतिनिधित्व की प्रणाली, जिस रूप में उसकी व्यवस्था खंड 1 और 4 में की
गई है, बनी रहेगी जब तक कि इस समझौते से संबद्ध संप्रदायों के बीच आपसी
समझौते द्वारा तय न कर ली जाए।
- दलित वर्गों के वास्ते केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान-मंडलों के लिए मताधिकार
उस प्रकार होगा, जिस प्रकार उसका उल्लेख लोथियन कमेटी की रिपोर्ट में
किया गया है।
- जहां तक किसी स्थानीय निकाय के लिए निर्वाचन अथवा लोक सेवा में
नियुक्त का संबंध है किसी के लिए इस आधार पर कोई अयोग्यता नहीं होगी
कि वह दलित वर्ग का सदस्य है।
इस बात का भरसक प्रयास किया जाएगा कि इन मामलों में दलित वर्गों को
समुचित प्रतिनिधित्व मिले, लेकिन शर्त होगी कि उनके पास ऐसी शैक्षिक योग्यता
हो, जिसकी व्यवस्था लोक सेवाओं में नियुक्ति के लिए की जाए।
- हर प्रांत में शिक्षा संबंधी अनुदान में से पर्याप्त राशि की अलग से व्यवस्था
दलित वर्गों के लोगों को शिक्षा की सुविधाएं प्रदान करने के लिए की जाए।
समझौते की शर्तें श्री गांधी ने स्वीकार कीं। सरकार ने उन्हें लागू किया और उनका समावेश भारत सरकार अधिनियम में किया।
आमरण अनशन श्री गांधी का एक बड़ा दांव था। संभवतः उनका विचार था कि केवल आमरण अनशन की धमकी से मैं और दलित वर्ग के मेरे अन्य साथी घबराकर झुक जाएंगे। लेकिन शीघ्र ही उन्हें पता चल गया कि उनका अनुमान सही नहीं था और अस्पृश्य भी अपने अधिकारों के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करने के लिए उतने ही कृत-संकल्प थे। उनके अपने अनुयायियों के अलावा अन्य किसी को भी इस बारे में संतोष नहीं था कि श्री गांधी के अनशन का कोई नैतिक अधिकार था। यदि श्री गांधी को नया जीवन-दान मिला तो उसका पूरा श्रेय उनके प्रति अस्पृश्यों की उदारता और सद्भावना को जाता है।
लेकिन प्रश्न है कि पूना समझौता करने से अस्पृश्यों को क्या लाभ हुआ। इसे समझने के लिए हमें विधान-मंडलों के लिए हुए चुनावों के परिणामों की निरख-परख करनी ही होगी। भारत सरकार अधिनियम, 1937 में लागू हुआ। फरवरी 1937 में अधिनियम की व्याख्या के अनुसार नए विधान-मंडलों के लिए चुनाव हुए। जहां तक अस्पृश्यों का संबंध है, फरवरी 1937 में जो चुनाव हुए, वे पूना समझौते के अनुसार