गांधी और उनका अनशन
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है। निश्चय ही अस्पृश्यों के आंदोलन का अर्थ होगा, सवर्ण हिंदुओं के खिलाफ खुला संघर्ष। कांग्रेस के भीतर अस्पृश्यों का आंदोलन हो ही नहीं सकता। निश्चय ही इसका अर्थ होना चाहिए, पार्टी के भीतर ही भयंकर संघर्ष। लेकिन कांग्रेस अपनी रक्षा के लिए उसकी अनुमति नहीं दे सकती।
कांग्रेस में शामिल होने वाले अस्पृश्यों पर कांग्रेस ने यह कड़ी पाबंदी लगा दी है कि वे अस्पृश्यों का ऐसा कोई स्वतंत्र आंदोलन नहीं चला सकते, जिसकी अनुमति उच्च कमान ने न दी हो। नजीजा यह है कि जिन प्रांतों में अस्पृश्य कांग्रेस में शामिल हो गए हैं, वहां अस्पृश्यों का आंदोलन वस्तुतः ठप्प हो गया है।
अस्पृश्यों को विधान-मंडल में बोलने और काम करने की आजादी होनी ही चाहिए, यदि उन्हें अपनी शिकायतों को व्यक्त करना है और राजनीतिक कार्यवाही से अपनी पीड़ाओं को दूर कराना है। लेकिन अस्पृश्यों के जो प्रतिनिधि कांग्रेस में शामिल हो गए हैं, उन्होंने बोलने और काम करने की इस आजादी को गंवा दिया है। अपनी इच्छा के अनुसार न वे वोट दे सकते हैं और न ही बोल सकते हैं। न वे प्रश्न कर सकते हैं और न ही वे कोई संकल्प या विधेयक प्रस्तुत कर सकते हैं। वे पूर्णतया कांग्रेस कार्यकारिणी के नियंत्रण में रहते हैं। उन्हें केवल उतनी ही स्वतंत्रता मिलती है, जितनी की कांग्रेस कार्यकारिणी उन्हे देना चाहे। नजीजा यह है कि भले ही अस्पृश्यों की विपदाएं दिनों-दिन बढ़ती जा रही हों, पर विधान-मंडल के अस्पृश्य सदस्य उनके बारे में एक सवाल तक नहीं उठा सकते। उनकी दशा इतनी दयनीय हो गई कि कांग्रेस पार्टी कभी-कभी तो उनसे ऐसे विधेयक के खिलाफ वोट देने की अपेक्षा करती है, जो विधान-मंडल के अस्पृश्य सदस्यों की राय में अस्पृश्यों के लिए हितकर हो। ऐसी एक घटना हाल में मद्रास में हुई। मद्रास विधान-मंडल के सदस्य राव बहादुर राजा ने एक विधेयक प्रस्तुत किया। उसका उद्देश्य था कि मद्रास प्रेसिडेंसी में अस्पृश्यों को हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिया जाए। पहले तो कांग्रेसी सरकार ने उसके समर्थन का वचन दिया। बाद में मद्रास में कांग्रेसी सरकार ने अपनी राय बदल दी और विधेयक का विरोध किया। मद्रास विधान-मंडल के अस्पृश्य सदस्य भारी दुविधा में पड़ गए। लेकिन उनके पास कोई चारा न था। सचेतक (व्हिप) का आदेश लागू किया और उन्होंने सामूहिक रूप से विधेयक के विरुद्ध मत दिया। अस्पृश्यों के प्रतिनिधि अस्पृश्यों के हितों के रखवाले समझे जाते हैं। लेकिन कांग्रेस में शामिल हो जाने के कारण उनकी स्थिति मुख पर पट्टी बंधे कुत्तों जैसी हो गई है। काटना तो दूर की बात है, वे भौंक भी नहीं सकते। इन अस्पृश्य सदस्यों ने बोलने और काम करने की जो आजादी गंवा दी है, उसका केवल एक ही कारण है कि वे कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। और कांगे्रस के अनुशासन के फंदे में फंस गए हैं।
कांग्रेस में शामिल हो जाने के अस्पृश्यों की तीसरा नुकसान यह हुआ है कि वे अस्पृश्यों को कोई वास्तविक लाभ नहीं पहुंचा सके हैं। इसके दो करण हैं। एक तो यह