सभ्यता या घोर असभ्यता
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रहते हों, क्योंकि यह खबर डाक से भेजने पर गांव में हिंदू अपने रिश्तेदारों में अपने को गिरा हुआ अनुभव करने लगता है। यदि हिंदू-घरों की स्त्रियां अपने मायके जाएं या वहां से वापस आएं तो अस्पृश्य को उनके साथ ही जाना पड़ेगा। उनकी प्रतिष्ठा का तकाजा है कि उनके नौकर-चाकर होने चाहिएं। और केवल अस्पृश्य ही वह एकमात्र उपलब्ध वर्ग है, जिससे यह काम कुछ खर्च किए बिना कराया जा सकता है। हिंदू के घर के हर समारोह में अस्पृश्यों को आकर दासोचित कर्म करना ही चाहिए। अस्पृश्य को न तो जमीन खरीद कर उस पर खेती करनी चाहिए और न ही उसे स्वतंत्र जीवन बिताना चाहिए। अपना पेट भरने के लिए उसे हिंदू-घरों की झूठन पर निर्वाह करना चाहिए और गांव में मरने वाले पशुओं का मांस खाना चाहिए। इस झूठन को इकट्ठा करने के लिए उसे घर-घर जाना चाहिए। भीख मांगने के लिए उसे शाम के वक्त जाना चाहिए। इसी तरह अस्पृश्य को मरे हुए जानवर को गांव से बाहर ले जाना ही पड़ेगा। निश्चय ही उसे यह काम अकेले ही करना चाहिए, क्योंकि कोई भी हिंदू इसमें उसका साथ नहीं देगा। अस्पृश्य को ऐसे धंधे नहीं करने चाहिएं, जो उसे सवर्ण हिंदुओं के ऊपर सत्ता और अधिकार दें। उसे विनम्र होना चाहिए और उससे अधिक की मांग नहीं करनी चाहिए, जो उसे नियत किया गया है। यह सच है कि कुछ अस्पृश्य उस निम्न स्तर से ऊंचे उठ गए हैं जो उन्हें परपंरा के अनुसार नियत रहा है और उन्होंने ऊंचे पद प्राप्त कर लिए हैं, तो भी इनमें से अधिकांश सामाजिकता की दृष्टि से अत्यंत निम्न स्थिति में हैं और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत निर्धन हैं।
यह सात करोड़े 95 लाख लोगों की दशा है। मृत नहीं तो इन जीवनमृत जीवों की समस्या कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं है। इन तीनों वर्गों की कुल संख्या अमरीका की आबादी से 60 प्रतिशत से भी अधिक है और ब्रिटिश साम्राज्य में श्वेतों की आबादी से 95 लाख अधिक है। इटली की आबादी से वह तीन करोड़ 70 लाख अधिक है। जर्मनी की आबादी से वह एक करोड़े 35 लाख अधिक है और फ्रांस की आबादी से तीन करोड़ 75 लाख। बेल्जियम की आबादी का वह दस गुना और डेनमार्क की आबादी का बीस गुना है। अभागे दलित मानवों की यह संख्या कितनी अधिक है?
III
इस कहानी का दुखद या यों कहें कि चित्त तो क्षुब्ध कर देने वाला पक्ष यह है कि इन अभागे मानवों की दशा क्या वैसी होनी चाहिए, जैसी कि वह है, जब कि वे उच्च सभ्यता के बीच रहते और पलते आए हैं। निश्चय ही हर निष्पक्ष की यह प्रतिक्रिया होती है कि ऐसी सभ्यता में जरूर कोई बड़ी बुनियादी विकृति है, जिसके