गांधी और उनका अनशन
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से भूना है और उच्च न्यायालयों द्वारा दंडित अपराधियों को रिहा कर दिया है। रिहाई का केवल यही आधार है कि उन्हें रिहा करने का अधिकार है। मुझे आश्चर्य है कि कांग्रेस ने इतनी जल्दी यह दिखा दिया है कि वे इंग्लैंड के टोरियों (अनुदारवादियों) के प्रतिरूप ही हैं। कांग्रेस के शासक वर्ग की क्रांति का, यानी अंग्रेज को खदेड़ने का समूचा जोश ठंडा पड़ गया है। अब जब उन्हें जनता के शोषण का मौका मिल गया है तो वे भरपूर शोषण के लिए सत्ता और अधिकार से चिपके रहना चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि साम्राज्य-विरोध का कोई विचार उनके काम में खलल डाले।
सामाजिक तथा आर्थिक पुनर्निमाण के आमूल परिवर्तनवादी कार्यक्रम के बिना अस्पृश्य कभी भी अपनी दशा में सुधार नहीं कर सकते। चूंकि कांग्रेस आमूल परिवर्तनवादी पार्टी नहीं है, अतः उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता कि वह ऐसा कोई कार्यक्रम हाथ में लेगी। अस्पृश्यों के लिए ऐसी पार्टी में शामिल होना बेकार और बेमानी है। कांग्रेस उनके लिए कुछ भी नहीं करेगी। उल्टे वह पहले की भांति उनका दुरुपयोग करेगी।
हो सकता है कि परिस्थितियों से विवश होकर कांग्रेस अस्पृश्यों के लिए कुछ करे। केवल एक ही परिस्थिति में कांग्रेस ऐसी विवशता अनुभव करेगी। वह यह है कि विधान-मंडल में अपने बहुमत के लिए वह अस्पृश्यों के प्रतिनिधियों पर निर्भर करे। तभी अस्पृश्य कांग्रेस से अपनी शर्तें मनवाने की स्थिति में होंगे और कांग्रेस को विवश होकर उन्हें मानना पड़ेगा। ऐसी निर्भरता की स्थिति में अस्पृश्यों के लिए सार्थक होगा कि वे कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाएं। वह सही सौदा होगा। लेकिन इस समय तो स्थिति यह है कि सर्वत्र कांग्रेस का इतना भारी बहुमत है कि विधान-मंडल में उसका पूर्ण वर्चस्व है। उसे कोई बाह्य समर्थन नहीं चाहिए। जो अस्पृश्य कांग्रेस में हैं, वे उसकी पूंछ के अंतिम सिरे पर हैं और पूंछ इतनी लंबी है कि वह हिल नहीं सकती। यह दूसरी वजह है, जिसके कारण कांग्रेस में शामिल होने से अस्पृश्यों को कोई लाभ नहीं हो सकता।
कांग्रेस में शामिल होने से अस्पृश्यों को ऐसे नुकसान हुए हैं। वे केवल नुकसान ही नहीं है। मैं तो उन्हें घोर दृष्परिणाम कहता हूं। समूची सामाजिक गतिविधि ठप्प हो गई है। समूचे राजनीतिक अधिकार छिन गए हैं। यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि नए संविधान के अधीन अस्पृश्य प्रगति नहीं कर रह हैं। वस्तुतः उन्हें जंजीरों से जकड़ दिया गया है।
लेकिन निश्चय ही यह प्रश्न पूछा जाएगा कि यदि कांग्रेस में शामिल होने के ऐसे दुष्परिणाम हैं, तो ये अस्पृश्य उसमें शामिल क्यों हुए? कांग्रेस के विरोध में उन्होंने स्वतंत्र रूप से चुनाव क्यों नहीं लड़े? जिन कुछ अस्पृश्यों ने कांग्रेस के टिकट