256 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पर चुनाव लड़ा, वे केवल स्वार्थजीवी लोग थे और कुछ बनने की चाह रखते थे। विधान-मंडल में इसलिए जाना चाहते थे कि जब लाभ के पद बांटे जाएं, तो उनका भी नंबर आ जाए। उन्हें इसकी परवाह नहीं थी कि किसके समर्थन से वे वहां पहुंचे। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी और उसका टिकट विधान-मंडल में पहुंचने का सर्वाधिक निश्चित उपाय था। अतः इन स्वार्थजीवियों को लगा कि कांग्रेस में शामिल होना चुनाव में सफल होने का सबसे आसान तरीका था। वे अवसर नहीं खोना चाहते थे। इससे उनका प्रयोजन तो स्पष्ट हो जाता है, पर इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि किस कारण से विवश होकर वे कांग्रेस में शामिल हुए। मुझे यकीन है कि वे स्वार्थजीवी भी कांग्रेस में शामिल न होते, यदि वे कांग्रेस के सहारे के बिना चुनाव में सफल हो सकते। वे कांग्रेस में ही शामिल हुए, क्योंकि उन्होंने देखा कि स्वतंत्र मार्ग असंभव था। वे कांग्रेस में शामिल होने पर विवश क्यों हुए? उत्तर है कि यह सब अनिष्ट संयुक्त निर्वाचन- क्षेत्र प्रणाली के कारण हुआ, जो पूना समझौते की उपज थी।
यदि अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के लिए संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र हो, तो निश्चय ही अल्पसंख्यकों का अनिष्ट होगा। अल्पसंख्यकों द्वारा खड़ा किया उम्मीदवार फिर भी असफल नहीं हो सकता, यदि समूचे अल्पसंख्यक एकजुट होकर उसका समर्थन भी करें। यदि अल्पसंख्यकों के लिए सीट आरक्षित कर दी जाती है तो उससे केवल यह सुरक्षा मिलती है कि अल्पसंख्यकों का उम्मीदवार निर्वाचित हो जाएगा। लेकिन उससे यह गारंटी नहीं मिलती कि चुनाव जीतने वाला अल्पसंख्यकों का उम्मीदवार उनका चहेता उम्मीदवार होगा, यदि चुनाव संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र प्रणाली से होगा। भले ही किन्हीं अल्पसंख्यकों के लिए सीट आरक्षित कर दी जाए, पर बहुमत सदा ही अपनी मर्जी के किसी अल्पसंख्यक को चुन सकता है और उसे अल्पसंख्यकों के उम्मीदवार के खिलाफ आरक्षित सीट के लिए खड़ा कर सकता है और अपनी फालतू मतदान-शक्ति के बल पर अपने मनोनीत उम्मीदवार को जिता सकता है। नजीजा यह होता है कि आरक्षित सीट के लिए चुना गया अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधि अल्पसंख्यकों का पक्षधर न होकर वास्तव में बहुमत का गुलाम हो जाता है।
विधान-मंडल के निर्वाचन के लिए अब गठित निर्वाचन-प्रणाली में सवर्ण हिंदुओं के मुकाबिले अस्पृश्य वोटर शोचनीय अल्पसंख्या में हैं। कुछ मिसालों से पता चल जाएगा कि विभिन्न निर्वाचन-क्षेत्रों में अस्पृश्य तथा सवर्ण हिंदू वोटरों की संख्या में कितनी भारी विसंगति है।
संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र से चुनावों में बहुसंख्यकों को अनिष्ट करने की जो शक्ति मिलती है, वह बहुत अधिक बढ़ जाती है, यदि निर्वाचन प्रणाली एक सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र पर आधारित हो।