गांधी और उनका अनशन
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वोट होते हैं, जितनी की सीटें, लेकिन वह किसी एक सदस्य को केवल एक ही वोट दे सकता है। हालांकि दोनों अलग-अलग दीख पड़ती हैं, पर प्रभाव में कोई अंतर नहीं हो सकता, क्योंकि संचयी मतदान प्रणाली के अधीन भी वोटर पर यह रोक नहीं है कि वह अपने वोटों का वितरण न कर सके। उसे छूट है कि वह एक उम्मीदवार को एक वोट दे सके। लेकिन हिंदू कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। उनका मुख्य उद्देश्य था कि वे संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र में अस्पृश्यों के लिए आरक्षित सीट के चुनाव में सवर्ण हिंदुओं के फालतू वोटों को अपने मनोनीत अस्पृश्य उम्मीदवार के पक्ष में प्रवाहित कर सकें। उद्देश्य था कि संख्या की दृष्टि से अस्पृश्य वोटरों को मात दे दी जाए, ताकि वे अपने मनोनीत उम्मीदवार को न चुन सकें। ऐसा तभी किया जा सकता है जब सवर्ण हिंदू वोटरों के फालतू वोटों के रुख को सवर्ण हिंदू उम्मीदवार से अस्पृश्य उम्मीदवारों की ओर कर दिया जाए। संचयी प्रणाली की अपेक्षा वितरणशील प्रणाली के अधीन इन फालतू वोटरों के दिशा-परिवर्तन की अधिक संभावना है। वितरणशील प्रणाली के अधीन सवर्ण हिंदू वोटर सवर्ण हिंदू उम्मीदवार को केवल एक ही वोट दे सकता है। दूसरे वोट का उपयोग सवर्ण हिंदू उम्मीदवार के लिए नहीं हो सकता। अतः उसका उपयोग केवल अस्पृश्य उम्मीदवार के लिए किया जा सकता है। वितरणशील प्रणाली के अधीन इस बात का अधिक अवसर है कि अस्पृश्यों के लिए आरक्षित सीट के चुनाव की ओर मतदान-शक्ति को प्रवाहित किया जा सके। इसी कारण सवर्ण हिंदुओं ने इसे संचयी मतदान प्रणाली से बेहतर समझा। लेकिन वे जोखिम नहीं उठाना चाहते। उनकी दृष्टि से वितरणशील प्रणाली भी पूर्णतया त्रुटिहीन नहीं थी। वितरणशील प्रणाली के अधीन वोटर के लिए अपने सभी वोटों के उपयोग की अनिवार्यता नहीं थी। वह चाहे तो सवर्ण हिंदू उम्मीदवार के लिए एक वोट का इस्तेमाल करे और शेष वोटों का इस्तेमाल न करे। इस अवस्था में अपने मनोनीत अस्पृश्य को लाने का उनका उद्देश्य विफल हो जाएगा। परिस्थितियों को संयोग के भरोसे न छोड़कर हिंदू चाहते थे कि वितरणशील मतदान प्रणाली को अनिवार्य बना दिया जाए, ताकि चाहे सवर्ण हिंदू वोटर की इच्छा हो या न हो, उसके पास केवल एक ही विकल्प रह जाए कि वह हिंदुओं के मनोनीत अस्पृश्य उम्मीदवार को ही वोट दे।
इस प्रकार दोनों प्रस्ताव हिंदुओं की गहरी साजिश का हिस्सा थे। उन्हें हैमंड कमेटी ने ठुकरा दिया। लेकिन स्वयं पूना समझौते में अनिष्ट की इतनी गुंजाइश है कि इन दोनों प्रस्तावों को ठुकराए जाने से भी हिंदुओं की इस शक्ति में किसी प्रकार की क्षीणता नहीं आई है कि वे अस्पृश्यों को दिए गए प्रतिनिधित्व संबंधी विशेष अधिकार को निरर्थक कर दें।