260 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पूना समझौते के फलस्वरूप अस्पृश्यों पर पड़ी घोर विपदा के बावजूद श्री गांधी के ऐसे मित्रों की कमी नहीं है, जो कहते हैं कि पूना समझौता तो अस्पृश्यों के लिए महान वरदान है।
सबसे पहले तो यह कहा जाता है कि पूना समझौते के फलस्वरूप अस्पृश्यों को सांप्रदायिक निर्णय से भी अधिक सीटें मिली हैं। यह सच है कि पूना समझौते के फलस्वरूप अस्पृश्यों को 151 सीटें मिलीं, जब कि सांप्रदायिक निर्णय के फलस्वरूप उन्हें केवल 78 सीटें मिली थीं। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना कि पूना समझौते से उन्हें सांप्रदायिक निर्णय से अधिक उपलब्धि हुई, उस उपलब्धि की अपेक्षा करना है जो उन्हें वास्तव में निर्णय से हुई।
सांप्रदायिक निर्णय से अस्पृश्यों को दो लाभ हुएः (1) अस्पृश्यों के पृथक निर्वाचक-मंडलों द्वारा चुनी जाने वाली सीटों का निश्चित कोटा जो अस्पृश्यों द्वारा भरी जाएं, और (2) दोहरा वोट, एक पृथक निर्वाचक-मंडलों के जरिए उपयोग के लिए और दूसरा सामान्य निर्वाचन-क्षेत्रों के जरिए उपयोग के लिए।
अब जहां पूना समझौते के अधीन सीटों के निश्चित कोटे में वृद्धि की गई, वहीं उसके अधीन दोहरे वोट का अधिकार भी छीन लिया गया। सीटों में इस बढ़ोतरी को किसी भी प्रकार दोहरे वोट के नुकसान का मुआवजा नहीं माना जा सकता। सांप्रदायिक निर्णय के अधीन दिया गया दूसरा वोट अनमोल विशेषाधिकार था। वह अनमोल राजनीतिक अधिकार था। हर निर्वाचन-क्षेत्र में अस्पृश्यों की मत-संख्या का अनुपात 1ः10 था। सवर्ण हिंदू उम्मीदवारों के चुनाव में मतदान की इस छूट के आधार पर अस्पृश्य सामान्य निर्वाचन के मसले पर यदि आदेश देने की स्थिति में नहीं तो निर्णय को दिशा देने की स्थिति में तो अवश्य होते। कोई भी सवर्ण हिंदू उम्मीदवार अपने निर्वाचन-क्षेत्र में अस्पृश्यों की या उनके हितों की उपेक्षा या उनका विरोध करने का साहस नहीं कर सकता था, यदि उसे अस्पृश्यों के वोटों पर निर्भर कर दिया जाता। आज सांप्रदायिक निर्णय की अपेक्षा अस्पृश्यों को कुछ थोड़ी-सी सीटें मिली हैं। इसके अलावा उन्हें कुछ भी नहीं मिला है। हर अन्य सदस्य यदि विरोधी नहीं तो उदासीन तो अवश्य है। यदि दोहरी मतदान प्रणाली वाला सांप्रदायिक निर्णय बना रहता तो अस्पृश्यों के पास कुछ कम सीटें होतीं, लेकिन हर अन्य सदस्य अस्पृश्यों का सदस्य नहीं होता। अस्पृश्यों के लिए सीटों की संख्या में वृद्धि नाममात्र की वृद्धि है।
तर्क के लिए मान भी लें कि पूना समझौते के फलस्वरूप कुछ और सीटें मिल गईं, फिर भी सवाल यह रह जाता है कि ये अतिरिक्त सीटें किस काम की हैं। सामान्यतः वोट के अधिकार के बारे में यह समझा जाता है कि वह राजनीतिक सुरक्षा का पर्याप्त साधन है। लेकिन यह अनुभव किया गया कि अस्पृश्यों के मामले में केवल वोट का