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गांधी और उनका अनशन

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अधिकार काफी नहीं होगा। आंशका थी कि यदि अस्पृश्यों के वोटों पर चुना जाने वाला सदस्य स्वयं अस्पृश्य नहीं है, तो वह मिथ्या आचरण कर सकता है और हो सकता है कि वह उनमें कोई दिलचस्पी न ले। यह विचार बनाया गया कि अस्पृश्यों की शिकायतो को विधान-मंडल में उठाना ही होगा और उसे सुनिश्चित करने का सबसे सही तरीका यह व्यवस्था होगी कि उनके लिए कतिपय सीटों का आरक्षण करना ही होगा, ताकि विधान-मंडल में अस्पृश्यों का प्रतिनिधित्व अस्पृश्य ही करें। अब यह स्पष्ट हो गया है कि यह आशा पूरी नहीं हुई है। इसमें संदेह नहीं कि सांप्रदायिक निर्णय के फलस्वरूप कुछ कम सीटें मिली थीं। लेकिन वे सभी आजाद लोग होते। पूना समझौते के फलस्वरूप अधिक सीटों की प्राप्ति हुई, पर वे सभी गुलामों द्वारा भरी गई हैं। यदि गुलामों की पलटन का कोई लाभ है, तो पूना समझौते को लाभप्रद कहा जा सकता है।

पूना समझौते के पक्ष में दूसरा तर्क यह दिया गया है कि पृथक निर्वाचक-मंडलों को समाप्त करके उसने अस्पृश्यों पर अस्पृश्यता का शाश्वत ठप्पा नहीं लगने दिया। लंदन में दिए गए अपने एक भाषण में श्री गांधी ने कहाः

मुसलमान और सिख सुसंगठित हैं। अस्पृश्य नहीं हैं। उनमें राजनीतिक चेतना नहीं

के बराबर है। उनके साथ इतना घोर अभद्र व्यवहार किया जाता है कि स्वयं उन्हीं के

विरोध से मैं उनकी रक्षा करना चाहता हूं। यदि उनके लिए पृथक निर्वाचक-मंडल

होंगे तो गांवों में उनका जीना दूभर हो जाएगा। गांव तो हिंदू रूढि़वादियों के गढ़ हैं।

हिंदुओं के उच्च वर्ग ही युगों से अस्पृश्यों की उपेक्षा करते रहे हैं। अतः उन्हें ही

उसके लिए प्रायश्चित करना है। प्रायशित दो प्रकार से किया जा सकता है। उसके

लिए सजग सामाजिक सुधार किए जाएं और सेवा के कार्यों से अस्पृश्यों की दशा

को और सहनीय बनाया जाए। उनके लिए पृथक निर्वाचक-मंडलों की मांग करना

सही मार्ग नहीं है। उन्हें पृथक निर्वाचक-मंडल देकर आप अस्पृश्यों और रूढि़वादियों

के मानस में फूट का बीज बो देंगे। आपको यह समझना ही होगा कि मुसलमानों

तथा सिखों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व के प्रस्ताव को मैं केवल अनिवार्य बुराई

के रूप में सहन कर सकता हूं। अस्पृश्यों के लिए तो यह एक वास्तविक खतरा

होगा। मुझे पूर्ण विश्वास है कि अस्पृश्यों के लिए पृथक निर्वाचक-मंडलों का प्रश्न

... सरकार की आधुनिक रचना है। केवल आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें

मतदाता-सूची में शामिल किया जाए और संविधान में उनके लिए मूल अधिकारों

की व्यवस्था की जाए। यदि उनके साथ अन्याय किया जाता है और उनके प्रतिनिधि

का जान-बूझकर बहिष्कार किया जाता है, तो उन्हें विशेष निर्वाचन-न्यायाधिकरण के

पास जाने का अधिकार होगा। वह उन्हें पूर्ण सुरक्षा प्रदान करेगा। इन न्यायाधिकरणों

को यह अधिकार होना चाहिए कि वे निर्वाचित सदस्य को अपदस्थ करने का और

बहिष्कृत व्यक्ति के निर्वाचन का आदेश दे सकें।