गांधी और उनका अनशन
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यह स्पष्ट है कि मताधिकार की पात्रता को काफी नीचा करने पर भी, जिससे
निश्चय की दलित वर्गों के वोटरों का अनुपात बढ़ जाएगा, यह आशा नहीं रहेगी
कि सामान्य निर्वाचन-क्षेत्रों में दलित वर्गों के अपने प्रतिनिधि चुने जाएंगे। इसके
लिए तो विशेष व्यवस्था करनी होगी। लंबी अवधि मे दलित वर्गों की उन्नति
जहां तक वे उसे राजनीतिक प्रभाव से प्राप्त कर सकते हैं, इस बात पर निर्भर
करेगी कि वे इतनी पर्याप्त महत्वपूर्ण स्थिति प्राप्त कर लें कि दूसरे वर्ग के लोग
उनसे समर्थन की मांग करें और उनकी जरूरतों पर विचार करें।
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- .... .... अतः यह दीख पड़ेगा कि हम यह सिफारिश नहीं करते
कि दलित वर्गों को सीटें उनकी पूरी आबादी के अनुपात से आबंटित की जाएं।
आरक्षित प्रतिनिधित्व का जो पैमाना सुझाया गया है, उससे दलित वर्गों के विधान
परिषद सदस्यों की संख्या में काफी वृद्धि हो जाएगी। अधिकांशतः वे गरीब और
अशिक्षित हैं। इस बारे में अत्यधिक संदेह है कि क्या काफी संख्या में पर्याप्त
सुगोग्य सदस्यों की तुरंत व्यवस्था हो सकेगी? अतः यह कहीं बेहतर होगा कि
उनका प्रतिनिधित्व सुयोग्य प्रवक्ता करें, न कि अधिक संख्या में निष्प्रभावी लोग,
जिनके बारे में पूरी संभावना है कि वे उच्च वर्गों की जी-हजूरी ही करेंगे। विभिन्न
प्रकार के प्रतिनिधियों के बीच इस समय सीटों के पुनः बंटवारे का जो प्रयास
किया जा रहा है, वह स्थाई नहीं हो सकता और उसके संशोधन के लिए प्रावधान
करना ही होगा। लेकिन हमारा विचार है कि फिलहाल हमारा प्रस्ताव पर्याप्त है,
खास तौर पर इसलिए कि सीटों के आरक्षण द्वारा राय का प्रतिनिधित्व इस प्रकार
आरक्षित न की गई सीटों को प्राप्त करने की संभावना को नहीं नकारता।
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लेकिन इस बारे में कोई संदेह नहीं हो सकता कि यह तर्क हास्यास्पद है। यह जरूरी नहीं कि किसी व्यक्ति को दूसरों से अलग श्रेणी में रखना बुराई ही हो। लगाया गया कोई ठप्पा भला है या बुरा, यह उसमें निहित प्रयोजन पर निर्भर करता है। यदि उद्देश्य उसे अधिकारों से वंचित करना है, तो ऐसा ठप्प लगाना निश्चय की घोर बुराई होगी। लेकिन यदि प्रयोजन यह है कि ठप्पा लगाकर उसे विशेषाधिकार दिलवाया जाए जो वह बुराई न होकर अति हितकर उपाय होगा। किसी अस्पृश्य को पृथक मतदाता-सूची में दर्ज करना आपत्तिजनक होगा, यदि उद्देश्य उसे मताधिकार के अधिकार से वंचित करना हो। विशेष प्रतिनिधित्व का लाभ प्रदान करने के लिए उसे पृथक मतदाता-सूची में दर्ज कराना निश्चय ही उसके लिए हितकर होगा। यदि अंतिम लक्ष्य के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह देख पाना कठिन होगा