264 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कि कैसे अस्पृश्यों की दोस्ती का दम भरने वाला कोई व्यक्ति उनके लिए पृथक निर्वाचक-मंडल की व्यवस्था पर आपत्ति कर सकता है। पृथक निर्वाचक-मंडल के विरुद्ध श्री गांधी का तर्क न केवल हास्यास्पद था, बल्कि अनिष्ठापूर्ण भी। श्री गांधी ने पृथक निर्वाचक-मंडलों पर आपत्ति की, क्योंकि इसका अर्थ अस्पृश्यों पर ठप्पा लगाया जाना था। लेकिन संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्रों में इस ठप्पे से कैसे बचा जा सकता है, यह समझ से परे की बात है। संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र में अस्पृश्यों के लिए सीट के आरक्षण में ऐसा ठप्पा निहित होना ही चाहिए और वह निहित भी है, क्योंकि आरक्षण का लाभ उठाने वाले उम्मीदवार को नियमानुसर घोषणा करनी ही होगी कि वह अस्पृश्य है। संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र में उस सीमा तक निश्चय ही एक ठप्पा शामिल है और श्री गांधी को संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्रों पर उतनी ही उग्रता से आपत्ति करनी चाहिए थी, जितनी उग्रता से उन्होंने पृथक निर्वाचक-मंडलों पर की थी। या तो श्री गांधी अनिष्ठापूर्ण थे या फिर वह जानते ही नहीं थे कि वह किसके बारे में कह रहे थे।
श्री गांधी के मित्रों ने शांत मन से कभी यह विचार नहीं किया कि पूना समझौते के अधीन अस्पृश्य कहां तक विधान-मंडलों में अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए स्वतंत्र व्यक्तियों को भेज सके हैं। क्या ये प्रतिनिधि कोई संघर्ष कर रहे हैं और कहां तक वे सफल हो पा रहे हैं। यदि शांत मन से उन्होंन ऐसा किया होता तो वे संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्रों और पूना समझौते का गुणगान करने पर लज्जित होते। बहुसंख्यक समुदाय के रूप में कांग्रेस तथा हिंदुओं ने शर्मनाक ढंग से अपनी सत्ता और अपने संसाधनों का दुरुपयोग किया है। न केवल उन्होंने अस्पृश्यों को उनकी मर्जी से व्यक्ति चुनने से रोका है, न केवल अपने फालतू वोटों को इस्तेमाल करके अपने मनोनीत व्यक्तियों को चुनाव में जिताया है, बल्कि उन्होंने कुछ ऐसा कार्य किया है, जिस पर विश्व के किसी भी भाग की कोई भी भद्र पार्टी स्वयं पर लज्जित होती। अस्पृश्यों के लिए आरक्षित सीटों को भरने के लिए अस्पृश्यों में से उम्मीदवारों का जो चयन कांग्रेस ने किया, वह अति कायरता तथा नीचता से पूर्ण कार्य था।
कांग्रेस जो हिंदुओं का ही राजनीतिक उपनाम है, उसको छूट थी कि वह पूना समझौते द्वारा निर्धारित सीटों से अधिक का लाभ अस्पृश्यों को दे सकती थी। सामान्य सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए अस्पृश्य उम्मीदवारों को अपनाकर वह ऐसा कर सकती थी। कानून में ऐसी कोई पाबंदी नहीं थी, जो उन्हें ऐसा करने से रोकती। लेकिन कांग्रेस ने ऐसा कुछ नहीं किया। इससे पता चलता है कि यदि अस्पृश्यों के लिए किसी सीट का आरक्षण न होता तो हिंदू कभी यह देखने की परवाह न करते कि कोई अस्पृश्य विधान-मंडल के लिए चुना जाए इसके। विपरीत जब सीटों का आरक्षण हुआ तो हिंदू