गांधी और उनका अनशन
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आरक्षण के प्रभाव को विफल करने में अग्रणी बने और उन्होंने प्रयास किया कि सीटें ऐसे अस्पृश्यों को मिलें, जो उनके गुलाम बनने के लिए राजी हों।
राजनीतिक अधिकारों के लिए अस्पृश्यों के इस संघर्ष का ऐसा दुखद अंत हुआ है। मैं निस्संकोच होकर कह सकता हूं कि इसका पूर्ण दायित्व श्री गांधी पर है।
सांप्रदायिक निर्णय का विरोध श्री गांधी ने इस आधार पर किया कि उसमें पृथक निर्वाचक-मंडलों की व्यवस्था थी, पर यह आधार नितांत गलत था। यदि हिंदू उनके अनशन के कारण पागल न हो गए होते तो वे निश्चय ही देख पाते कि आधार गलत था। सांप्रदायिक निर्णय में पृथक निर्वाचक-मंडलों के अलावा संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्रों की भी व्यवस्था थी। अस्पृश्यों को दिए गए दूसरे वोट का उपयोग सवर्ण हिंदू उम्मीदवार के निर्वाचन में सामान्य निर्वाचन-क्षेत्र में किया जाना था। निश्चय ही यह संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र प्रणाली थी। सांप्रदायिक निर्णय और पूना समझौते के बीच का भेद निर्वाचन-क्षेत्रों के स्वरूप में निहित है। दोनों में संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्रों का प्रावधान है। दोनों में भेद यह है कि सांप्रदायिक निर्णय के संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र का उद्देश्य यह था कि सवर्ण हिंदू उम्मीवार के चुनाव में भाग लेकर अस्पृश्य उस पर प्रभाव डाल सकें, पर पूना समझौते के संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र पर उद्देश्य है कि अस्पृश्य उम्मीदवारों के चुनाव में भाग लेकर सवर्ण हिंदू उस पर प्रभाव डाल सकें। दोनों के बीच यह वास्तविक भेद है।
अस्पृश्यों का हितेषी क्या चाहेगा? वह सांप्रदायिक निर्णय के संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्रों का समर्थन करेगा या पूना समझौते के संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्रों का? निश्चय ही अस्पृश्यों का वास्तविक उद्धार इसी में है कि हिंदुओं को अस्पृश्यों के मतों का मोहताज बना दिया जाए। यही काम सांप्रदायिक निर्णय ने किया है। अस्पृश्यों को हिंदुओं के मतों का मोहताज बनाना उन्हें हिंदुओं का और गुलाम बनाना है। गुलाम तो वे पहले से हैं ही। पूना समझौते की यह करतूत है। सांप्रदायिक निर्णय का उद्देश्य अस्पृश्यों को हिंदुओं की दासता के चुंगल से मुक्त कराना था। पूना समझौते का उद्देश्य हिंदुओं के अधीन रखना है।
श्री गांधी के ‘आमरण अनशन’ का बखान एवं गुणगान भव्य शब्दों में श्री गांधी के भारतीय तथा विदेशी मित्रों और प्रशंसकों ने किया। उसे ‘दूसरा क्रूसारोपण’ ‘शहादत’ और ‘विजय-संघर्ष’ जैसे महान शब्दों से विभूषित किया गया। श्री गांधी के एक अमरीकी मित्र ने अमरीकियों को आश्वासन दिया कि श्री गांधी के अपने जीवन के उत्सर्ग का दांव न तो बाजीगरी है और न ही जादू की छड़ी का कमाल है। एक अन्य अमरीकी ने तो अपने भावावेश में इतना कह डाला कि वह तो ‘अकेले दुनिया से लोहा ले रहे हैं। वह तो इसके साक्षात मूर्तरूप हैं।’ निश्चय ही इस ड्रामे का मुझे