266 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
खलनायक बनाया गया। निश्चय ही श्री गांधी के अनशन के बारे में मेरे अपने अलग विचार थे। मैंने उसे राजनीतिक ‘ढकोसला’ कहा। उनके शब्दों से मेरे कानों में सदा झूठ और फरेब की टंकार आती रही।
मुझे सदैव ऐसा लगा कि सांप्रदायिक निर्णय के विरोध में श्री गांधी के अनशन के पीछे प्रेरणा यह नहीं थी कि वह अस्पृश्यों के बंधन काटना चाहते थे, बल्कि यह थी कि वह हिंदुओं को बर्बादी से बचाना चाहते थे। वह किसी भी कीमत पर उसे करना चाहते थे, भले ही वह अस्पृश्यों की राजनीतक गुलामी ही क्यों न हो। सांप्रदायिक निर्णय की उनकी अस्वीकृति वैसी ही थी, जैसी कि गृह-युद्ध के बाद दक्षिण अमरीका के रहने वालों द्वारा नीग्रो के मताधिकार की अस्वीकृति। ‘स्टेट्समैन’ तथा ‘नेशन’ का भी यह निष्कर्ष था। उन्होंने कहा थाः (उद्धरण का उल्लेख न तो मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में है और न ही उसे अन्यत्र खोजा जा सकाµसंपादक)।
उस समय मेरे दृष्टिकोण से सहमति का एकमात्र यही उदाहरण था। तब कुछ विख्यात अस्पृश्यों ने भी श्री गांधी का समर्थन किया था। एक अजब मामला श्री राजा का था। उनकी शिकायत थी कि यद्यपि वह केंद्रीय सभा के सदस्य थे और उन्हें दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व करने के लिए मनोनीति किया गया था, फिर भी उनका चयन गोलमेज सम्मेलन के प्रतिनिधि के रूप में नहीं किया गया था। वह पृथक निर्वाचक-मंडलों के लिए संघर्ष कर रहे थे। अचानक उन्होंने अपना रवैया बदल लिया। वह श्री गांधी के पखधर बन गए और मुझ पर पृथक निर्वाचक-मंडलों की मांग करने और ब्रिटिश सरकार पर उसे स्वीकार करने के लिए घनघोर गर्जना करने लगे। श्री गांधी के प्रति उनका प्रेम इतना प्रगाढ़ हो चला था और हिंदुओं के प्रति उनकी आस्था इतनी प्रबल हो चुकी थी कि कोई भी संदेह नहीं कर सकता था कि वह केवल भाड़े के टट्टू का काम कर रहे थे। श्री गांधी के अनशन के बारे में 13 सितंबर, 1932 को केंद्रीय विधान-मंडल में प्रस्तुत किए गए एक स्थगन प्रस्ताव पर बोलते हुए श्री राजा ने कहा थाः
दलित वर्गों के मसले को भारत के इतिहास में जितना महत्व आज मिला
है, उतना पहले कभी नहीं मिला था। इसके लिए हम दलित वर्गों के लोग सदैव
महात्मा गांधी के ट्टणी रहेंगे। उन्होंन दो-टूक शब्दों में समूचे संसार को बता
व जता दिया है कि हमारा पुनरुद्धार ही उनके जीवन का मूल लक्ष्य है। यदि
दुनिया की अंतरात्मा अब भी दलित वर्गों की स्थिति के प्रति सचेत नहीं होती तो
हम केवल यही निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि आज दुनिया में मानव की समूची
भावनाएं ही जड़ हो गई हैं।