गांधी और उनका अनशन
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आज सदन को उस स्थिति पर विचार करना है, जो इस कारण पैदा हो गई है कि महात्मा गांधी दलित वर्गों के लिए सांप्रदायिक निर्वाचक-मंडलों की व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं। मुझे विश्वास है कि सदन के हर मानवीय सदस्य को इस बात पर खेद होगा कि परिस्थितियों ने ऐसे महान व्यक्तित्व को अपने प्राणों को न्योछावर करने की प्रतिज्ञा करने पर विवश कर दिया है। लेकिन, श्रीमन्, पत्राचार से पता चलता है कि सरकार को पर्याप्त चेतावनी दे दी गई थी। यदि हमारे सम्मेलनों में और राजा-मुंज समझौते में, जिस पर मैंने और हिंदू महासभा के अध्यक्ष ने हस्ताक्षर किए थे, अभिव्यक्त हमारे सुविचारित दृष्टिकाणों को उसने पूर्ण महत्व प्रदान नहीं किया, तो कम से कम उसे महात्मा गांधी की गंभीर चेतावनी पर तो ध्यान देना ही चाहिए था और पृथक निर्वाचक-मंडलों के गठन के मार्ग को छोड़ देना चाहिए था।
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महात्मा गांधी को प्रधानमंत्री द्वारा भेजे गए पत्र के बारे में वस्तुतः यह मेरी मुख्य आपत्ति है। वह हमें बताते हैं कि उन्होंने हमें बीस वर्षों के लिए पृथक नर्वाचक-मंडलो दिए है, ताकि हम न्यूनतम संख्या में सीटें प्राप्त कर सकें और तत्कालीन सरकार और निर्वाचक-मंडल के सामने अपने विचार रख सकें। मेरा कहना है कि मोंटफोर्ड सुधारों के अधीन वह विशेषाधिकार तो हमें पहले से ही प्राप्त है। उन सुधारों के फलस्वरूप हमें अनेक स्थानीय निकायों में तथा प्रांतीय एवं केंद्रीय विधान-मंडलों में प्रतिनिधित्व मिल सका है। इस प्रयोजन के लिए हम काफी संगठित हैं और उसके लिए हमे विशेष पैरवी अथवा विशेष अनुकंपा की जरूरत नहीं है। भविष्य में हमारे उत्थान के लिए इस वास्तविक उपाय की जरूरत है कि हमें निश्चित अधिकार मिलें, ताकि हम सामान्य निर्वाचन-क्षेत्रों से अपने प्रतिनिधि चुन सकें और उन्हें उनके कार्यों के लिए अपने प्रति जवाबदेह ठहरा सकें। मैं नहीं जानता कि किस कारण सीटों के आरक्षण वाली संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्रों की योजना को प्रधानमंत्री अव्यावहारिक बता रहे हैं। मद्रास तथा कुछ अन्य प्रांतों के स्थानीय निकायों में वह पहले से लागू है और अति संतोषजनक रही है। श्रीमन्, मेरा कहना है कि सांप्रदायिक निर्णय में प्रतिपादित योजना में हमारा अलगाव शामिल है और वह हमें राजनीतिक रूप से अस्पृश्य बनाती है। प्रधानमंत्री की इस दलील पर मुझे हैरत है कि कोई अलगाव नहीं है, क्योंकि हम हिंदुओं को वोट दे सकते हैं और उन्हें हमारे मतों के लिए याचना करनी पड़ेगी। लेकिन, श्रीमन्, नागरिकता के सांझे आदर्श को हम कैसे प्राप्त कर सकते हैं, जब दलित वर्ग के प्रतिनिधियों को उच्च जातियों के वोटों की याचना नहीं करनी होगी?