11. गांधी और उनका अनशन - Page 283

268 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सवर्ण हिंदुओं ने स्वयं स्वीकार किया है कि उनके हाथों मेरे समुदाय को

कष्ट भोगने पड़े हैं और मैं यह स्वीकार करने के लिए तैयार हूं कि उनके बीच

अनेक सुधारक हैं, जो हमारी प्रतिष्ठा और स्थिति को सुधारने के लिए भरसक

चेष्टा कर रहे हैं। मुझे पूर्ण संतोष और स्थिति को सुधारने के लिए भरसक चेष्टा

कर रहे हैं। मुझे पूर्ण संतोष है कि सवर्ण हिंदुओं में हृदय-परिवर्तन हुआ है और

उनका दृष्टिकोण बदला है। हम दलित वर्गों के लोग स्वयं को उतना ही सच्च

हिंदू समझते हैं, जितना कि कोई सवर्ण हिंदू हो सकता है। हमारा विचार है कि

हिंदुओं की नैतिक चेतना इतनी जागृत हो चुकी है कि हमार उद्धार हिंदू समाज के

मुख्य समूह के भीतर से परिवर्तन लाकर ही हो सकता है, हमें उनसे अलग-थलग

करके नहीं। सरकार ने जो मार्ग अपनाया है, उसके कारण इस अति प्रशंसनीय

आंदोलन की प्रगति में बाधा पड़ेगी। श्रीमन्, मुझे कहना ही होगा कि प्रधानमंत्री

के पत्र की समूची संकल्पना और अभिव्यक्ति ने मुझे निराश किया है।

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आज हमारे सामने जो संकट है, वह अति गंभीर है। हमारे युग के महानतम

भारतीय का जीवन अधर में लटका हुआ है और इस देश के करोड़ों दलितों का

भविष्य भी अधर में लटका हुआ है। क्या सरकार यह जिम्मेदारी लेगी कि वह

एक की हत्या कर दे और औरों को सदा-सर्वदा के लिए गुलाम बना दे? बेहतर

होगा कि वह अपना निर्णय भली-भांति सोच-समझकर करे।

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श्री राजा ने न केवल पूना समझौते का समर्थन किया, बलिक उन्होंने वितरणशील मतदान के लिए भी संघर्ष किया। इस कार्य के बारे में मैं पहले ही कह चुका हूं कि वह हिंदुओं के इस षडयंत्र का ही अभिन्न अंग था कि अस्पृश्यों की राजनीतिक गुलामी में कोई कोर-कसर अथवा त्रुटि न रह जाए। नए भक्त श्री राजा श्री गांधी तथा हिंदुओं के इतने दीवाने हो चुके थे कि वह इस मामले में हैमंड कमेटी के समाधान से संतुष्ट नहीं हुए। चुनाव के बाद उन्होंने मामले को पुनः उठाया और वितरणशील मतदान ख्1, के पक्ष में मद्रास विधान सभा में संकल्प प्रस्तुत किया।

लेकिन आज पूरा समझौते के परिणामों को देखने के बाद ऐसा लगता है कि श्री राजा को मोहभंग हो गया है। इससे अधिक मैं क्या कह सकता हूं कि जिस नए सत्य की खोज उन्होंने की है, उसके प्रति वह कब तक निष्ठावान रहेंगे। लेकिन उन्होंने स्वयं को खुलेआम पूना समझौते का कट्टर विरोधी घोषित किया है। श्री गांधी के नाम अपने 25 अगस्त, 1938 के पत्र में श्री राजा फरमाते हैंः

देखिए, मद्रास विधान सभा का वाद-विवाद।