11. गांधी और उनका अनशन - Page 284

गांधी और उनका अनशन

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आपको याद होगा कि जब मेरे अधिकांश लोग पृथक निर्वाचक-मंडलों के पक्ष में थे, ताकि वे निष्ठापूर्ण और प्रभावशाली ढंग से विधान-मंडलों में अपनी बात कह सकें, तो किस प्रकार आपने उन्हें न केवल राजनीतिक रूप से, बल्कि सामाजिक तथा धार्मिक रूप से भी हिंदू परिधि में लाने के लिए अपने जीवन को दांव पर लगा दिया था। और फिर मैं भी इस बात के लिए कम उत्तरदायी नहीं था कि मेरे लोग सवर्ण हिंदुओं के साथ संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र का समर्थन करें। इसके पीछे यह स्पष्ट आश्वासन था कि हम बिना किसी रोकटोक के अपने ऐसे लोग चुन सकेंगे, जो हमारी शिकायतों और हमारी आकांशाओं को निष्ठापूर्वक अभिव्यक्त कर सकेंगे। इसी प्रयोजन से तालिका-निर्वाचन की स्थापना की गई थी।

इस सबकी जानकारी आपको भी है और मुझे भी। लेकिन तथ्य को स्मरण कराने में मेरा प्रयोजन यह दर्शाता है कि जहां हमने पूर्ण निष्ठा से पूना समझोते का पालन किया और पृथक निर्वाचक-मंडल का संघर्ष छोड़ दिया, वहां मद्रास में सवर्ण हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करने वाले कांग्रेस पार्टी के लोगों ने समझौते का उल्लंघन किया। इसका नतीजा यह हुआ कि विधान सभा में मंत्रालय द्वारा लाए जाने वाले हर विधेयक पर हमारे समुदाय को सवर्ण हिंदुओं का अनुसरण आंख-मीचकर करना पड़ता है। हमें उन मामलों में भी उनके साथ वोट देना पड़ता है, जो हमारे समुदाय के हितों पर गहरा कुप्रभाव डालते हैं।

शायद आपको याद होगा कि चुनाव के प्रारंभ में मैंने कांग्रेस कमेटी से विरोध प्रकट करते हुए कहा था कि वह दलित वर्गों में से तालिका-निर्वाचन के लिए उम्मीदवार खड़े न करे। आपने सद्भाव जताते हुए कहा था कि मैं उनसे कुछ शर्तों पर अपने समुदाय को कांग्रेस में शामिल होने की अनुमति दे सकता हूं, जो हमारे सामने श्री एस. सत्यमूर्ति ने रखी थीं। उनमें से एक शर्त यह थी कि अपने समुदाय पर प्रभाव डालने वाले मामलों में कांग्रेस पार्टी के दलित वर्ग के लोगों के लिए जरूरी नहीं कि वे कांग्रेसी सदस्यों के साथ मिलकर वोट दे। वे अपने विवेक के अनुसार वोट दे सकते हैं।

मद्रास विधान सभा में मंदिर-प्रवेश विधेयक पर हाल के वाद-विवाद में यह घिनौना तथ्य उजागर हो गया है कि विधान सभा में कांग्रेस पार्टी के अनुशासन से नियंत्रित दलित वर्ग के सभी सदस्यों ने एकजुट होकर विधेयक को प्रवर समिति को सौंपे जाने के मेरे प्रस्ताव के विरोध में मत दिया। क्या इससे भी ज्यादा अस्वाभाविक और अपमानजनक कोई बात हो सकती थी, जो यह सिद्ध कर सके कि मेरा समुदाय उन सवर्ण हिंदुओं का गुलाम था, जिनके प्रतिनिधि श्री राजगोपालाचारी थे?