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गांधी और उनका अनशन

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वाद-विवाद के दौरान मैंने श्री राजगोपालाचारी से पूछा था कि क्या उन्होंने उस रवैए के बारे में आपकी अनुमति ले ली थी, जिसे उन्होंने अचानक इतने अप्रत्याशित ढंग से अपना लिया था। अध्यक्ष महोदय ने कहा था कि मेरे भाषण के समापन के बाद श्री राजगोपालाचारी को सवाल का जवाब देने का अवसर दिया जाएगा। यद्यपि उन्हें मेरे बाद बोलने का सुअवसर दिया गया था, उन्होंने सवाल को टाल दिया और उसका कोई जवाब नहीं दिया।

मुझे आशा है कि हरिजन-उत्थान, विशेषतः मंदिर-प्रवेश के प्रति मद्रास में कांग्रेसी मंत्रालय के रवैए के मसले, पर आप अति गंभीरतापूर्वक विचार करेंगे और मुझे अपना दृष्टिकोण बताएंगे, ताकि में अपने समुदाय के लोगों को उत्तर दे सकूं। इस मसले के बारे में वे अति क्षुब्ध हैं। वे सोच रहे हैं कि पूना समझौते को रद्द कर दिया जाए और किसी प्रकार की सीधी कार्यवाही के साथ-साथ पृथक निर्वाचक-मंडल के लिए संघर्ष भी छेड़ दिया जाए।

श्री राजा ने 12 सितंबर, 1938 को महात्मा गांधी को वर्धा से यह तार भी भेजाः

मंत्रालय द्वारा मेरे विधायक की अस्वीकृति पर आक्रोश जोरों पर, मुझ पर कठिन असह्य दबाव-आतुरता से उत्तर की प्रतीक्षा।

श्री गांधी ने 14 सितंबर, 1938 को श्री राजा को उत्तर दियाः

प्रिय मित्र,

आपके पत्र का उत्तर देरी से देने के लिए क्षमा चाहूंगा। मैं अति व्यस्त हूं। अब आपके तार का उत्तर दे पा रहा हूं।

मेरी इच्छा है कि आप श्री राजगोपालाचारी पर भरोसा करें। वह अपना भरसक प्रयास करेंगे। उन्हें अपने ढंग से काम करने दें। यदि आप भरोसा नहीं कर सकते, तो स्वाभाविक है कि आप वह मार्ग अपनाएंगे जो आपको रास आएगा। मैं तो बस इतना जानता हूं कि हरिजनों का उनसे बढ़कर हितैषी और कोई नहीं है। उनके पास जाइए, उनसे तर्क-संगत बात कीजिए और यदि आप उन्हें राजी नहीं कर सकते, तो उनसे सहानुभूति कीजिए। यही मेरी सलाह है।

श्री राजा ने दिनांक 21 सितंबर, 1938 को श्री गांधी को एक पत्र लिखा। उसमें कहा गयाः