गांधी और उनका अनशन
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राजगोपालाचारी ने हाल ही में प्रस्तुत किए हैं। लेकिन मैं आपसे आशा करता हूं कि जहां तक दलित वर्गों का संबंध है, आप अपने अविस्मरणीय अनशन के दौरान दलित वर्गों को दिए गए वचनों को ध्यान में रखते हुए मद्रास की स्थिति के बारे में और गंभीरता से विचार करेंगे।
नैतिक दृष्टि से आप बाध्य हैं कि आप इसे अंतरात्मा का विषय बनाएं, न कि केवल राजनीतिक रणनीति का। मैं आश्वासन देता हूं कि यदि आप अस्पृश्यता एवं मंदिर-प्रवेश के इस विषय पर ‘आंतरिक प्रकाश’ की खोज करेंगे तो आप अधिक स्पष्ट वाणी में बोलेंगे और अपने अनुयायियों को शिक्षित करने के लिए आवश्यक बलिदान करेंगे।
मैं इस पत्राचार को प्रेस को भेजना चाहता हूं, पर मैं इस महीने के अंत तक आपके किसी और उत्तर की प्रतीक्षा करूंगा।
श्री गांधी ने 8 अक्तूबर, 1938 को उपर्युक्त का उत्तर दियाः
प्रिय मित्र,
मैं कठिन परिस्थितियों में काम कर रहा हूं। इसके बावजूद मैं रेलगाड़ी से पेशावर जाते हुए उत्तर दे रहा हूं।
निश्चय ही जब भी आप उचित समझें, उस पत्राचार को छापें, जो हमारे बीच हुआ है।
आपका पिछला पत्र दर्शाता है कि आप गलती पर हैं। मैं राजाजी का पक्ष नहीं ले रहा हूं। लेकिन में चाहता हूं कि अस्पृश्या के बारे में वह उतने ही अटल हैं, जितना कि स्वयं मैं। अतः मुझे उनके निर्णय पर विश्वास करना ही होगा कि वह कार्य को किस प्रकार करें। इतने फासले से मैं उनके कार्य का आकलन नहीं कर सकता। क्या आपको नहीं दीख पड़ता कि समूचा आंदोलन सनातनियों के हृदय-परिवर्तन का है? आप गति में तेजी नहीं ला सकते, सिवाय इसके कि स्वयं सुधारों की बलि दे दी जाए। यह प्रक्रिया जोरों से चल रही है।
मंदिर-प्रवेश का यह मसला एक सशक्त धार्मिक सुधार है। मैं चाहूंगा कि इसके लिए आप अपनी धर्म-बुद्धि का इस्तेमाल करें। यदि आप ऐसा करेंगे तो आप राजाजी को अपना हार्दिक समर्थन प्रदान करेंगे और उनके प्रयास को पूर्णतया सफल करेंगे।
संयुक्त प्रांत के अस्पृश्यों ने भी पूना समझौते के विरुद्ध अपना क्षोभ प्रकट किया है। इस संबंध में भारत उप-मंत्री कर्नल म्योरहेड को दिए गए एक ज्ञापन में उन्होंने कहाः (ज्ञापन मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में टंमि नहीं किया गयाµसंपादक)।