274 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
समूचे भारत में अस्पृश्यों ने अनुभव कर लिया है कि पूना समझौता एक जाल है और ब्रिटिश सरकार के सांप्रदायिक निर्णय के स्थान पर श्री गांधी के पूना समझौते को लाने का परिवर्तन ऐसा परिवर्तन है, जो वास्तव में आजादी के स्थान पर गुलामी लाने का परिवर्तन है।
पूना समझौते पर 24 सितंबर, 1932 को हस्ताक्षर किए गए। 25 सितंबर, 1932 को इसे समर्थन प्रदान करने के लिए बंबई में हिंदुओं की एक सार्वजनिक सभा हुई। उस सभा में निम्न संकल्प पारित किया गयाः
यह सम्मेलन 24 सिंतबर, 1932 को सवर्ण हिंदुओं तथा दलित वर्गों के
नेताओं के बीच हुए पूना समझौते को पुष्ट करता है और विश्वास करता है
कि ब्रिटिश सरकार हिंदू समाज के भीतर पृथक निर्वाचक-मंडलों के गठन के
अपने निर्णय को वापस ले लेगी और समझौते को पूर्णतः स्वीकार कर लेगी।
सम्मेलन अनुरोध करता है कि सरकार तुरंत कदम उठाए, ताकि महात्मा गांधी
अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अपना अनशन समाप्त कर सकें और समय रहते
ऐसा हो सके। सम्मेलन संबद्ध समुदायों के नेताओं से अपील करता है कि
वे समझौते तथा इस संकल्प के निहित अर्थों को समझें और उनकी पूर्ति के
लिए सच्चा प्रयास करें।
सम्मेलन संकल्प करता है कि अब से हिंदुओं में किसी को भी उसके
जन्म के कारण अस्पृश्य नहीं माना जाएगा और अब तक जिन्हें ऐसा माना
जाता रहा है, उन्हें वैसे ही अधिकार प्राप्त होंगे, जैसे कि सार्वजनिक कुओं,
सार्वजनिक स्कूलों, सार्वजनिक सड़कों तथा अन्य सभी सार्वजनिक संस्थाओं
के उपयोग के बारे में अन्य हिंदुओं को प्राप्त है। निश्चय ही इस अधिकार
को सर्वप्रथम अवसर मिलते ही कानूनी मान्यता दी जाएगी और वह स्वराज
संसद का सर्वप्रथम अधिनियम होगा, यदि उससे पूर्व उसे ऐसी मान्यता नहीं
मिली होगी।
यह भी तय है कि सभी हिंदू नेताओं का यह कर्तव्य होगा ही कि वे हर
वैध तथा शांतिपूर्ण साधन से शीघ्र ही उन सभी सामाजिक असुविधाओं को दूर
करेंगे, जो इस समय रीति-रिवाज द्वारा तथाकथित अस्पृश्य वर्गों पर थोपी गई हैं।
इनमें मंदिरों में प्रवेश पर रोक भी शामिल है।
II
श्री गांधी ने अनुभव किया कि अस्पृश्यों की समस्या के प्रति पूर्ण तथा समर्पित कोई संगठन होना चाहिए। तदनुसार 28 सितंबर, 1932 को अखिल भारतीय अस्पृश्यता