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गांधी और उनका अनशन

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निवारण लीग की स्थापना की गई। पर श्री गांधी को यह नाम अच्छा नहीं लगा। अतः दिसंबर 1932 में इसे नया नाम दिया गया-अस्पृश्य समाज सेवक। यह नाम भी श्री गांधी को ठीक नहीं लगा। उन्होंने उसे बदल दिया और उसे हरिजन सेवक संघ कहा।

श्री गांधी ने सर्वप्रथम परिवर्तन नाम में किया है। अस्पृश्य के स्थान पर अब उन्हें ‘हरिजन’ कहा जाता है। अस्पृश्यों का कहना है कि श्री गांधी स्वार्थी हैं। उन्होंने अस्पृश्यों को यह ‘हरिजन’ नाम देकर वैष्णवाद को उछाला और उभारा है। वह चाहते हैं कि अस्पृश्यों को ‘हरिजन’ अर्थात् शिव का भक्त कहा जाए। श्री गांधी का उत्तर है कि हरि का अर्थ है ईश्वर, न कि विष्णु और ‘हरिजन’ का सीधा-सा अर्थ है, ‘ईश्वर की संतान’।

अस्पृश्यों को तो ‘हरिजन’ नाम से ही घृणा है। इस नाम पर आपत्ति के अनेक आधार हैं। पहली तो यह कि इससे उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। हिंदुओं की नजरों में उसके कारण वे ऊंचे नहीं बने। नया नाम विषय-वस्तु की दृष्टि से पूरी तरह पुराने जैसा ही हो गया है। कौन नहीं जानता कि हरिजन पुराने अस्पृश्य ही हैं। नया नाम अस्पृश्यों को अस्पृश्यता के अभिशाप से कोई राहत नहीं देता। पुराने की भांति नए नाम से भी उन्हें दुत्कारा जाता है। दूसरे, अस्पृश्यों का कहना है कि वे अस्पृश्य कहलाना पसंद करते हैं। उनकी दलील है कि बेहतर होगा कि बुरोई को उसके जाने-पहचाने नाम से ही पुकारा जाए। मरीज के लिए यह जान लेना बेहतर होगा कि उसकी बीमारी क्या है। बुरा करने वाले के लिए यह जान लेना बेहतर होगा कि बुराई को अभी दूर किया जाना है। कोई भी दुराव-छिपाव विद्यमान तथ्यों के बारे में दोनों को गलत धारणा देगा। जहां तक कि नया नाम दुराव-छिपाव है, वह अस्पृश्यों के लिए धोखाधड़ी है और हिंदुओं के लिए झूठा पापमोचन है। तीसरे, यह भावना भी है कि हरिजन नाम दया का सूचक है। यदि नाम का अर्थ होता ‘खुदा के

खास बंदे’, जैसा कि दावा यहूदी अपने बारे में करते हैं, तो बात कुछ और होती। लेकिन उन्हें ‘ईश्वर की संतान’ कहकर उनकी असहाय और आश्रित अवस्था को उजागर करना है और उन पर अत्याचार करने वालों से दया की भीख की याजना करना है। अस्पृश्यों में जो अधिक पौरुष वाले हैं, वे इस नए नाम के अपमानजनक निहित अर्थों पर रोष प्रकट करते हैं। इस नए नाम के प्रति अस्पृश्यों का रोष कितना प्रबल है, वह इस तथ्य से जाना जा सकता है कि बंबई विधान सभा में अस्पृश्यों के प्रतिनिधियों का समूचा समूह विरोध प्रकट करते हुए सदन से उस समय बाहर चला गया, जब ‘हरिजन’ नाम को विधि की मान्यता देने वाले विधेयक को कांग्रेस की सरकार ने प्रस्तुत किया।