276 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यह नया नाम ‘हरिजन’ तब तक चलता रहेगा, जब तक कि श्री गांधी और उनके द्वारा रची गई कांग्रेसी सरकारों का पतन और पराभव नहीं हो जाता। लेकिन ये अकाट्य तथ्य हैं कि अस्पृश्यों पर यह नाम जबरन थोपा गया है और उससे उन्हें रत्ती-भर भी लाभ नहीं हुआ है।
इस नए नाम के वरदानों की चर्चा तो हो चुकी। अब मैं हरिजन सेवक संघ के कार्य की निरख-परख करना चाहूंगा। सेवक संघ के बारे में कहा जाता है कि अस्पृश्यों के उत्थान के लिए वह श्री गांधी के अथक श्रम का स्मारक है। इस संघ की क्या उपलब्धियां हैं?
सेवक संघ एक अखिल भारतीय संगठन है। उसका एक केंद्रीय बोर्ड है। फिर प्रांतीय बोर्ड है। और प्रांतीय बोर्डों के अधीन जिला एवं स्थानीय कमेटियां हैं। प्रांतीय बोर्डों तथा स्थानीय कमेटियों की संख्या इस प्रकार हैः
1932-33 1933-34 1934-35
प्रांतीय बोर्ड 26 26 29
जिला तथा स्थानीय कमेटियां 213 313 372
हरिजन सेवक संघ के वित्तीय संसाधन मुख्यतः श्री गांधी के एक अखिल भारतीय दौरे से एकत्र धनराशि से जुटाए जाते हैं। यह दौरा उन्होंने खास तौर पर इस प्रयोजन के लिए नवंबर 1933 और जुलाई 1934 के बीच किया था। इस दौरे के कुल मिलाकर कोई 8 लाख रुपये की राशि एकत्र की गई। इसे गांधी शैली निधि कहा जाता है। सेवक संघ की यह मुख्य आरक्षित निधि है। शेष संसाधन वार्षिक चंदो से बने हैं।
सभी मदों के अधीन संघ का वर्षवार कुल व्यय इस प्रकार हैः 1932-33 1933-34 1934-35 1935-36 रु. 2,31,039-00 3,31,791-00 4,48,422-00 3,99,354-00
अपनी 1934-35 की रिपोर्ट में महासचिव ने सूचना दी कि ‘गांधी थैली निधि की लगभग समूची राशि, जो जुलाई 1934 में 8 लाख रुपये से अधिक थी, चालू वर्ष के अंत तक, यानी सितंबर 1936 तक, समाप्त हो जाएगी।’ पांचवीं वार्षिक रिपोर्ट में सचिव ने कहा है, ‘गत वर्ष के खर्च की तुलना में कुल खर्च में एक लाख रुपये से अधिक की कमी आई है। आंशिक रूप से इसका कारण यह है कि गांधी थैली निधि धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। आम चुनावों तथा अन्य कारणों से स्थानीय चंदों की उगाही में कोताही हुई है। केंद्रीय कार्यालय की वित्तीय स्थिति अति असंतोषजनक है। केंद्रीय कार्यालय का कुल खर्च (शाखाओं को दिए गए अनुदानों को शामिल