गांधी और उनका अनशन
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करके) 86,610-14-8 रुपये था, जब कि आय 42,485-4-9 रुपये थी। इस प्रकार 44,125-9-11 रुपये का घाटा रहा। उसे सामानय निधि से पूरा किया गया। सामान्य निधि में केवल 26,176-4 रुपये का चंदा प्राप्त हुआ।
जाहिर है कि हरिजन सेवक संघ छोटा-सा संगठन है। यदि प्रेस लगातार उसका प्रचार-प्रसार न करता, तो उसका नाम भी सुनाई न देता। भारत एक विशाल महाद्व ीप है। उसमें कोई 6,96,831 [1] गांव हैं। अस्पृश्य इन सभी 6,96,831 गांवों में फैले हुए हैं। ऐसा एक भी गांव नहीं है, जिसमें अस्पृश्य न हों। 372 कमेटियों की पहुंच कितने अस्पृश्यों तक हो सकती है। यह संघ विशाल महासागर में नन्हीं बूंद के समान है। न केवल उसकी क्षमता इतनी सीमित है कि वह समस्या से नहीं जूझ सकता, बल्कि उसके संसाधन इतने अधिक कम हैं कि वह अस्पृश्यों को पर्याप्त रूप से कोई राहत नहीं पहुंचा सकता। अब सेवक संघ की कोई स्थाई निधि नहीं है। जो थी, वह खर्च हो चुकी है। उसे वार्षिक चंदे पर गुजारा करना पड़ता है। वह स्रोत भी अब सूखता जा रहा है। अब संघ भारी घाटे में है। संघ अब असहाय स्थिति में है। उसके दिवालिएपन के कारण उसका कामकाज तो वस्तुतः ठप्प हो गया होता। यदि सेवक संघ आज भी जीवित है तो उसका कारण यह नहीं है कि उसके प्रयोसों को अस्पृश्यों के उत्थान के लिए दी गई हिंदुओं की दान-राशि का सहारा मिल रहा है। वह जीवित है, क्योंकि विभिन्न प्रांतों में इस समय स्थापित कांगे्रस की सरकारें सेवक संघ को सहारा देने लेगी हैं। उन्होंने सेवक संघ को कतिपय ऐसा सामाजिक कार्य सौंप दिया गया है, जिसे पिछली सरकारें अनुदान देकर सरकारी विभागों अथवा सरकारी अधिकारियों की मार्फत करवाती थीं। इस प्रकार सेवक संघ आजकल सरकारी निधियों के सहारे सांस ले रहा है। वह ऐसा संगइन नहीं है, जिसे अस्पृश्यों के लिए दी जाने वाली हिंदुओं की दान-राशि के सहारे चला रहे हैं।
श्री गांधी के अनशन से जो शोरगुल मचा, वह तो केवल बहरा करने वाला था। उनके जीवन को बचाने के लिए त्याग की तत्परता महान थी और अस्पृश्यों से मैत्री करने के लिए दिखाई गई उत्सुकता आश्चर्य एवं अभिभूत करने वाली थी। लेकिन अब वह लुप्त हो गई है और अस्पृश्य असहाय व्यवस्था में रह गए हैं। हिंदुओं ने तो सेवक संघ की स्थापना अस्पृश्यों के प्रति अपने दायित्व के निर्वाह को पेशगी के रूप में की थी। यदि संघ के संचालन के लिए अंशदान की उनकी इच्छा को वास्तविक हृदय-परिवर्तन की कसौटी माना जाए तो स्वीकार करना ही होगा कि जिस अवसर ने उस परिवर्तन को जन्म दिया था, उसकी समाप्ति के साथ-साथ वह भी समाप्त
- जनगणना रिपोर्ट, 1931 से लिया गया है, क्योंकि मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में आंकड़े नहीं दिए गए
हैंµसंपादक।