गांधी और उनका अनशन
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करते हैं। ऐसे केवल इने-गिने अस्पृश्य हैं, जिनकी कोई आवाज संघ की गतिविधियों के निर्देशन में है। संघ से मेरा कोई सरोकार नहीं रहा है। लेकिन मैं कह सकता हूं कि जब हरिजन सेवक संघ चालू किया गया था तो मुझे उसमें शामिल होने का न्यौता दिया गया था। मेरी बड़ी इच्छा थी कि अस्पृश्यता-निवारण में हिंदुओं का हाथ बंटाऊं। इस महान कार्य को संपन्न करने के लिए संघ क्या नीति तथा कार्यक्रम अपनाए, इसके बारे में मेरे अपने निजी विचार थे। संघ की स्थापना के तुरंत बाद मुझे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन जाना पड़ा। मुझे यह अवसर ही नहीं मिल सका कि संघ के अन्य सदस्यों के साथ इस बारे में विचार कर सकूं। लेकिन जलपोत एम.वी. विक्टोरिया के केबिन से मैंने संघ के महासचिव श्री ठक्कर को एक 14 नवंबर, 1932 को भेजा था। प्रारंभिक छोटे से पैरा को छोड़कर पत्र के शेष भाग को मैं ज्यों-का-त्यों दे रहा हूं।
मेरी राय में दलित वर्गों के उत्थान के महान कार्य के लिए दो स्पष्ट
तरीके हो सकते हैं। एक विचारधारा यह है कि दलित वर्ग के व्यक्ति का
भाग्य उसके निजी कर्म से बंधा हुआ है। यदि वह अभावों और कष्टों से
ग्रस्त है कि उसका कारण यह है कि वह दुष्ट तथा पापी रहा ही होगा। इस
उप-कल्पना के आधार पर सामाजिक कार्यकर्ताओं की यह शाखा अपने समूचे
प्रयासों तथा संसाधनों को व्यक्तिगत सद्गुणों के विकास पर केंद्रित करती है।
इसके लिए वह ऐसे कार्यक्रम अपनाती है, जिसमें सहिष्णुता, व्यायामशाला,
सहकारिता, ग्रंथागार, स्कूल आदि जैसी मदें शामिल होती हैं। उनका उद्देश्य
होता है कि व्यक्ति को बेहतर और सद्गुण-संपन्न बनाया जाए। मेरे विचार में
इस समस्या के समाधान का एक अन्य दृष्टिकोण भी है। वह इस परिकल्पना
को लेकर चलता है कि किसी व्यक्ति का भाग्य उस पर्यावरण और परिस्थिति
से नियंत्रित होता है, जिसमें रहने के लिए वह विवश हो जाता है और यदि
कोई व्यक्ति अभावों और कष्टों से ग्रस्त है तो उसका कारण है कि उसका
पर्यावरण उसके अनुकूल नहीं है।
इसमें संदेह नहीं कि दोनों में से बाद वाला दृष्टिकोण अधिक सही है। हो
सकता है कि पूर्ववर्ती दृष्टिकोण कुछ चंद व्यक्तियों को उनके वर्ग के स्तर से
ऊपर उठा दे। वह समूचे वर्ग को उन्नत नहीं कर सकता। अस्पृश्यता-निवारण संघ
के लक्ष्य के बारे में मेरा दृष्टिकोण यह है कि उसका गठन इसलिए नहीं हुआ है
कि वह दलित वर्गों के अकस्मात चुने गए कुछ व्यक्तियों या कुछ खास बालकों
की मदद करे, बल्कि यह है कि वह समूचे वर्ग को उच्च धरातल पर ले जाए।
अतः मैं नहीं चाहूंगा कि संघ ऐसे कार्यक्रम पर अपनी शक्ति को बेकार करे,