11. गांधी और उनका अनशन - Page 296

गांधी और उनका अनशन

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कि वैकल्पिक नीति कम-से-कम प्रतिरोध का रवैया अपनाने की है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि अस्पृश्यता-उन्मूलन के मामले में वह निष्प्रभावी होगी।

निश्चय ही सवर्ण हिंदुओं के अज्ञानी जनसमूह के मानस में तर्क-सम्मत विचारों का मौन संप्रेषण दलित वगों के उद्धार के लिए काम नहीं कर सकता। पहली बात तो यह है कि सभी मानव-प्राणियों की भांति सवर्ण हिंदू भी दलित वर्गों के प्रति अस्पृश्यता के व्यवहार में अपने रूढि़गत आचरण का पालन करता है। सामान्यतः लोग अपनी रूढि़गत व्यवहार शैली को इसलिए नहीं तज देते कि कोई उसके विरुद्ध प्रचार कर रहा है।

दलित वर्गों का उद्धार तभी होगा, जब सवर्ण हिंदू को यह सोचने और अनुभव करने पर विवश किया जाए कि उसे अपने तौर-तरीके बदलने ही होंगे। उसके लिए आपको उसकी रूढि़गत आचार-संहिता के विरुद्ध सीधी कार्यवाही करके संकट उत्पन्न करना ही होगा। संकट उसे सोचने पर विवश करेगा और एक बार यदि वह सोचने लगेगा तो वह उस परिवर्तन के लिए अधिक तत्परता से तैयार हो जाएगा, जिसके लिए वह अन्यथा तैयार नहीं होता।

न्यूनतम प्रतिरोध और तर्क सम्मत विचारों के मौन संप्रेषण की नीति की भारी त्रुटि यह है कि वह ‘विवश नही करती, क्योंकि वह संकट पैदा नीह करती। महाड में चावदार तालाब, नासिक में कालाराम मंदिर और मलाबार में गुर्वायूर मंदिर के मामले में सीधी कार्यवाही ने चंद दिनों के भीतर जो करिश्मा करके दिखाया है, उसे सुधारक लाखों दिनों में प्रचार के कदापि नहीं कर पाते।

एक अन्य बात की उपेक्षा मैं अस्पृश्यता निवारण संघ से करूंगा। वह इस बात के लिए प्रयास करें कि दलित वर्गों को समान अवसर प्राप्त हो सकें। दलित वर्गों के कष्टों और निर्धनता का प्रमुख कारण यह है कि उन्हें समान अवसर नहीं मिलता। समान अवसर अस्पृश्यता के कारण नहीं मिलता। निश्चय ही आपको मालूम होगा कि गांवों में तथा शहरों में भी दलित वर्गों के लोग साग-सब्जी, दूध और मक्खन नहीं बेच सकते। ये रोजी-रोटी कमाने के ऐसे तरीके हैं, जो हरेक के लिए खुले हुए हैं। सवर्ण हिंदू अहिंदू से तो ये चीजें खरीद लेगा, पर दलित वर्गों के लोगों से इन्हें कभी नहीं खरीदेगा। रोजगार के मामले में उसकी हालत सबसे खस्ता है।

अमरीका के नीग्रो की भांति समृद्धि के दिनों में उसे सबसे बाद में पूछा जाता है और विपदा के दिनों में उस पर सबसे पहले मार पड़ती है। और जब वह अपने पैर जमा लेता है तो उसका भविष्य क्या होता है? बंबई तथा अहमदाबाद की कपड़ा मिलों में वह सबसे कम वेतन वाले विभागों में सड़ता रहता है। वहां वह केवल 25